[Preview books] [Borrow books] [Pause] जबमैं छोटा बच्चा था, तब मैं नियमित रूपसे एक ऐसा अभ्यास करता था, जिसके बारेमें मुझे ठीक-ठीक पता नहीं था कि वह क्या है। उस अभ्याससे मिली अंतिम अनुभूतिने मुझे उसकी ओर आकर्षित किया और मैं लंबे समयतक उसे करता रहा।बड़ेहोने और कई तरहकी चीज़ोंसे परिचित होनेके बाद ही मुझे समझमें आया कि मैं जो कररहा था, वह ध्यानका एक रूप था और जिस अनुभूतिने मुझे उसकी ओर आकर्षित किया था, वही 'समाधि' कहलाती है। आप किसी किताबको पढ़कर या ध्यानका प्रशिक्षण लेकर ध्यान करसकतेहैं। आपको कई तरहके अनुभव भी होसकतेहैं। लेकिन कभी-कभी आपके सामने कुछ सवाल आतेहैं – "क्या यह अनुभव किसी विश्वाससे प्रेरित था, या किसी विशेष अभ्यासका सहज परिणाम था? क्या ऐसा अनुभव उस व्यक्तिको भी होसकताहै, जिसे ध्यानके बारेमें कोई औपचारिक जानकारी नहीं है? क्या ध्यानका अनुभव उन विचारोंका परिणाम है, जिन्हें आपने खुद पैदा करके अपने ऊपर आरोपित करलिया है? या फिर वह इन सब चीज़ोंसे स्वतंत्र है?" और भी बहुतकुछ।अपने बचपनके अनुभवको देखें, तो यह स्पष्ट होजाताहै कि वह किसी भी विश्वास या मानसिक पृष्ठभूमिसे स्वतंत्र था। उस समय मैं पूरीतरह निर्दोष था, पूर्वाग्रहोंसे मुक्त था और ध्यानके बारेमें पूरीतरह अनजान था।इसलिए, किसी व्यक्तिकी मानसिक पृष्ठभूमि चाहे जैसी भी हो, मुझे लगता है कि जो भी व्यक्ति इस अभ्यासको करता है, उसके साथ यह सहजरूपसे घटित होता है।आखिर ध्यान क्या है?आज हमें ध्यानके अनेक रूप दिखाईदेतेहैं। लेकिन यहाँ मैं खुदको केवल उन बातोंतक सीमित रखना चाहता हूँ, जिनका वर्णन उपनिषदों, पतंजलिके योगसूत्रों या बौद्धोंके तिपिटक जैसे प्राचीन भारतीय ग्रंथोंमें किया गया है।ध्यान मनको धीरे-धीरे शांत करतेहुए पूर्ण प्रशांत अवस्थातक पहुँचनेका एक मार्ग है। उस प्रशांतताकी चरम अवस्थामें व्यक्ति जिस अवस्थामें प्रवेश करता है, उसे 'समाधि' कहा जाता है।माण्डूक्य उपनिषद जैसे उपनिषद उस अंतिम अवस्थाका वर्णन इस प्रकार करतेहैं:"यह ऐसी अवस्था है, जिसमें न तो बाहरी घटनाओंका बोध होता है और न ही विचारों और स्वप्नों जैसी आंतरिक मानसिक गतिविधियाँ होतीहैं। इसका यह अर्थ नहीं है कि वह चेतनाशून्य, जड़ अवस्था है। वहाँ बोध होता है, लेकिन वह बोध लौकिक जगतके व्यवहारसे ...
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