• [Hindi] ॐकार का चमत्कार (भाग 4): अनेक नहीं, केवल एक ही चेतना है!
    2026/07/25
    [Preview books] [Borrow books] [Pause] पिछले कुछ एपिसोडों में हमने चेतना के बारे में चर्चा की। हमने चेतना की चार अवस्थाओं—जाग्रत अवस्था, स्वप्न अवस्था, सुषुप्ति अवस्था और तुरीय की अवर्णनीय अवस्था—के बारे में बात की। सभी जीवधारी अलग-अलग समय पर इन चार अवस्थाओं में से किसी-न-किसी एक का अनुभव करते हैं।हमारी यह चर्चा भारत के प्राचीन उपनिषदों में से एक, माण्डूक्य उपनिषद, पर आधारित थी।पिछले एपिसोड के अंत में मैंने संकेत दिया था कि भारत के अनेक अद्वैत दार्शनिक इन चेतना-अवस्थाओं के बारे में एक भिन्न दृष्टिकोण रखते हैं। इस एपिसोड में मैं गौड़पाद द्वारा अपनी प्रसिद्ध माण्डूक्य कारिका—अर्थात् माण्डूक्य उपनिषद पर लिखी गई उनकी व्याख्या—में प्रस्तुत वैकल्पिक दृष्टिकोण का संक्षेप में वर्णन करूँगा।गौड़पाद कौन थे?गौड़पाद अद्वैत परंपरा के मूल दार्शनिक थे। उनका समय छठी शताब्दी ईस्वी का माना जाता है। वे प्रसिद्ध अद्वैत दार्शनिक शंकराचार्य के परमगुरु (गुरु के गुरु) थे।गौड़पाद ने क्या कहा? गौड़पाद के अनुसार, माण्डूक्य उपनिषद में वर्णित चेतना की पहली तीन अवस्थाएँ केवल आभास हैं; वे वास्तविक नहीं हैं। वास्तविक अवस्था केवल तुरीय है, और वही अकेली अन्य तीन अवस्थाओं के रूप में प्रकट होती है।यह समझानेकेलिए कि चेतना की एकमात्र अवस्था अन्य तीन अवस्थाओं के रूप में कैसे दिखाई देती है, गौड़पाद अनेक उपमाएँ देते हैं।स्वप्न की उपमा:जब कोई व्यक्ति स्वप्न देखता है, तब वह अनेक लोगों, अनेक स्थानों और अनेक घटनाओंकोदेखताहै। लेकिन वास्तव में वे सभी एक ही मन की रचना होते हैं—अर्थात् स्वप्न देखने वाले के मन की। उसी प्रकार गौड़पाद कहते हैं कि एक ही सार्वभौमिक चेतना अनेक जीवों के अस्तित्व का आभास उत्पन्न करती है, जिनमें से प्रत्येक किसी-न-किसी विशेष चेतना-अवस्था में प्रतीत होता है।इन जीवों का कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं है। वे स्वप्न में दिखाई देने वाले दृश्यों के समान हैं। स्वप्न समाप्त होते ही उसके सभी दृश्य और वस्तुएँ लुप्त हो जाती हैं, क्योंकि उनका वास्तव में कभी अस्तित्व था ही नहीं। वे केवल अस्तित्ववान प्रतीत होते थे। इसी प्रकार वास्तविकता में दिखाई देने वाली यह विविधता भी केवल प्रतीत होती है।यह समझानेकेलिए कि केवल एक चेतना ...
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  • [Hindi] ॐकार का चमत्कार — चेतना की अवर्णनीय चौथी अवस्था।
    2026/07/18
    [Preview books] [Borrow books] [Pause] पिछले एपिसोड में हमने अपने प्राचीन भारतीय दार्शनिकों द्वारा वर्णित चेतना की तीन अवस्थाओं पर चर्चा की थी। अपनी चर्चा के लिए हमने उपनिषदों में से एक, माण्डूक्य उपनिषद को आधार बनाया था।यह उपनिषद चेतना की तीन अवस्थाओं—जाग्रत अवस्था, स्वप्न अवस्था और सुषुप्ति अवस्था—के बारे में बताता है। ये वही तीन अवस्थाएँ हैं जिन्हें हम सभी जीवों में प्रतिदिन देखते हैं। इसके बाद यह 'तुरीय' नामक चौथी अवस्था का वर्णन करता है।आख़िर यह तुरीय अवस्था क्या है? जब भी किसी नई अवधारणा का परिचय कराया जाता है, तो उसकी तुलना पहले से ज्ञात बातों से करना, या उससे उसका अंतर बताना स्वाभाविक होता है। यह उपनिषद भी सबसे पहले यही करता है।उपनिषद कहता है कि तुरीय अवस्था, जाग्रत अवस्था जैसी नहीं है। जाग्रत अवस्था में हमारी चेतना बाहरी संसार के साथ व्यवहार करती है। लेकिन तुरीय अवस्था में ऐसा कोई बाहरी व्यवहार नहीं होता।उपनिषद यह भी कहता है कि यह चेतना किसी भी प्रकार के स्वप्न उत्पन्न नहीं करती। अर्थात् यह स्वप्न अवस्था से भी भिन्न है।तो क्या तुरीय ऐसी अवस्था हो सकती है जो आधी स्वप्न और आधी जाग्रत हो? उपनिषद इस संभावना को भी अस्वीकार कर देता है।ऐसी स्थिति में हमारे सामने केवल एक ही संभावना बचती है कि तुरीय, गहरी नींद की तरह चेतना की पूरी तरह सुप्त अवस्था होगी। गहरी नींद में हम ऐसा ही देखते हैं। लेकिन उपनिषद इस संभावना को भी नकार देता है।साथ ही उपनिषद यह भी कहता है कि तुरीय न तो ऐसी शून्य अवस्था है जिसमें कोई चेतना ही न हो, और न ही ऐसी अवस्था है जिसमें किसी विशेष वस्तु का ज्ञान हो।उपनिषद इन सभी बातों को संक्षेप में इस प्रकार कहता है—"न अन्तःप्रज्ञं, न बहिःप्रज्ञं, न उभयतःप्रज्ञं, न प्रज्ञानघनं, न प्रज्ञं, न अप्रज्ञं।"तो फिर वास्तव में तुरीय क्या है?यदि हमें किसी वस्तु का वर्णन 'यह ऐसा है' कहकर करना हो, तो उसका इन्द्रियों द्वारा ग्रहण किया जा सकना आवश्यक है। लेकिन उपनिषद कहता है कि तुरीय ऐसी कोई वस्तु नहीं है जिसे इन्द्रियों से ग्रहण किया जा सके।कभी-कभी किसी वस्तु का वर्णन यह बताकर किया जा सकता है कि उसका उपयोग किस काम के लिए होता है। लेकिन उपनिषद के अनुसार तुरीय ऐसी कोई वस्तु नहीं है जिसका किसी कार्य के लिए उपयोग ...
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  • [Hindi] ॐकार का जादू: चेतना की तीन अवस्थाएँ।
    2026/07/11
    [Preview books] [Borrow books] [Pause] पिछले एपिसोड में हम चर्चा कर रहे थे कि प्राचीन भारतीय चेतना की अवधारणा को किस प्रकार देखते थे। एक विशिष्ट उदाहरण के रूप में मैंने उपनिषदों में से एक, 'माण्डूक्य उपनिषद' को लिया था। माण्डूक्य उपनिषद अथर्ववेद का एक भाग है।यह छोटा-सा उपनिषद बताता है कि परम सत्य चेतना की चार अवस्थाओं के माध्यमसे किस प्रकार प्रकट होता है। वह उस परम सत्य को 'ॐकार' कहता है। यह चेतना की चार अवस्थाओं को जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति और तुरीय के रूपमें पहचानता है।ये अवस्थाएँ ॐकार द्वारा धारण किए गए असंख्य रूपों में विद्यमान हैं। जैसा कि हमने पहले चर्चा की थी, यह निश्चित रूपसे संभव है क्योंकि ॐकार देश और काल से परे है। ॐकार के विभिन्न रूप ही पूरे ब्रह्मांडमें व्याप्त जीव हैं। चूँकि वे रूप देश और काल के नियमों के अधीन हैं, इसलिए वे एक समयमें केवल एक ही अवस्था में रहसकतेहैं।इस एपिसोड में हम इन चार अवस्थाओं में से पहली तीन अवस्थाओं के बारेमें जानेंगे। सबसे पहली अवस्था जागने की अवस्था है, जिसे चेतना की 'जाग्रत' अवस्था कहा जाता है। इस अवस्था में जीव अपने शरीर के बाहर की दुनिया के साथ संपर्क करता है।वह अपने शरीर के बाहर की दुनिया से जानकारी एकत्र करने केलिए अपनी पाँच ज्ञानेन्द्रियों, जैसे आँखों और कानों, का उपयोग करता है। फिर वह उस जानकारी को अपने मन, बुद्धि, अहंकार और अन्य मानसिक क्षमताओं की सहायता से संसाधित करता है।जानकारी संसाधित होजानेकेबाद शरीर बाहरी वस्तुओं के साथ क्रिया करनेकेलिए अपने पाँच कर्मेन्द्रियों, जैसे हाथों और पैरों, का उपयोग करता है। प्राण जैसी पाँच जीवन-शक्तियाँ इस पूरी प्रक्रिया में शरीर और मन को सहारा देती हैं।मूल रूपसे जाग्रत वह चेतना की अवस्था है जो शरीर के बाहर स्थित स्थूल वस्तुओं के साथ व्यवहार करती है।उपनिषद इसका वर्णन इस प्रकार करता है।तंत्रिका-विज्ञान इसे किस प्रकार देखता है?तंत्रिका-विज्ञान की शब्दावली में इसे Access Consciousness कहा जाता है। तंत्रिका-विज्ञानी इस बातको काफी हदतक समझ चुके हैं कि शरीर और मस्तिष्क इस प्रकार की चेतना को किस प्रकार संभालते हैं।मस्तिष्क में विभिन्न विशिष्ट क्षेत्र होते हैं जो बाहरी ज्ञानेन्द्रियों से आनेवाली जानकारी को संसाधित करते हैं। जानकारी ...
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  • [Hindi] ओंकार का रहस्य : जो कुछ भी है, वह सब ओंकार ही है!
    2026/07/03
    [Preview books] [Borrow books] [Pause] पिछले एपिसोड्स में हमने बात की थी कि आधुनिक न्यूरोसाइंटिस्ट्स चेतना को कैसे समझाते हैं। वे चेतना को हमारे दिमाग औरउसकी कार्यप्रणाली से जोड़कर देखते हैं। उनकी नज़र में चेतना का मतलब है 'दिमाग की सक्रिय गतिविधि'। या फिर दिमाग के काम करने के तरीके से पैदा होनेवाला एकअनोखा फिनोमिना।इसके विपरीत, डेविड चैल्मर्स जैसे कॉग्निटिव फिलॉसफर्स इस बात से कैसे असहमत हैं, इसपर भी हमने चर्चा की थी। चैल्मर्स जैसों के मुताबिक, चेतना पूरी तरह से एक व्यक्तिगत औरआंतरिक अनुभव (subjective phenomenon) है। वे तर्क देते हैं कि इसे दिमाग के न्यूरॉन्स जैसी भौतिक चीज़ों के काम करने के तरीके तक कभी सीमित नहीं किया जा सकता। उनकी सोच में चेतना कोई भौतिक चीज़ नहीं है; बल्कि वह अपने आप में रहनेवाली एक स्वतंत्र शक्ति है। दिमाग तो सिर्फ उसे ज़ाहिर करने का एकज़रिया मात्र है।इसके अलावा, कुछ लोग ऐसे भी हैं जो खुद को 'पैनसाइकिस्ट्स' (सबमें चेतना देखने वाले) कहते हैं। वे परमाणु औरउप-परमाणु कणों जैसी भौतिक चीज़ों में भी चेतना को देखते हैं। उनका यह दावा है कि इन सूक्ष्म कणों की चेतना ही आपस में मिलकर मानव चेतना के रूप में सामने आती है!आइए, अब समय के पहिए को हज़ारों साल पीछे घुमाते हैं। मैं चेतना के बारे में कुछ बिल्कुल अलग विचार आपके सामने रखना चाहता हूँ। ये वे विचार हैं जो हज़ारों साल पहले भारत के प्राचीन दार्शनिकों के थे; यानी उपनिषदों के ऋषियों का नज़रिया। इन ऋषि-मुनियों के पास आज के पश्चिमी दार्शनिकों की तरह आधुनिक शब्दावली नहीं थी, और न ही आज के न्यूरोसाइंटिस्ट्स द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले अत्याधुनिक उपकरण थे।फिर भी, इतने प्राचीन काल में भी उनके पास जो वैचारिक स्पष्टता थी, उसे देखकर मैं दंग रह जाता हूँ। मैं उनके विचारों का सम्मान सिर्फ इसलिए नहीं करता कि मैं उनसे पूरी तरह सहमत हूँ। बल्कि इसलिए, क्योंकि उनके विचारों में सिर्फ इंसानों को ही नहीं, बल्कि इस दुनिया के चेतन औरअचेतन (सजीव औरनिर्जीव) सब कुछ को एक ही सूत्र में पिरोने की अद्भुत क्षमता है।आज की चर्चा के लिए मैंने सबसे प्राचीन दार्शनिक ग्रंथों में से एक 'मांडूक्य उपनिषद' को अपना आधार बनाया है। यह अथर्ववेद का हिस्सा रहा एक उपनिषद है। आकार में यह बेहद छोटा होने के ...
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  • [Hindi] क्या AI मानवोंकेलिए खतरा बनसकताहै?
    2026/06/27
    [Preview books] [Borrow books] [Pause] Goldman-Sachs जैसी संस्थाओंके अनुमानकेअनुसार, AI वैश्विक स्तरपर लगभग 300 मिलियन पूर्णकालिक नौकरियोंको ऑटोमेट करसकताहै। उन्होंने उल्लेख कियाहैकि वर्तमानमें अमेरिका और यूरोपकी लगभग दो-तिहाई नौकरियाँ किसी-न-किसी स्तरपर AI ऑटोमेशनसे प्रभावित होसकतीहैं।इंटरनेशनल लेबर ऑर्गनाइजेशन (ILO) का दृष्टिकोण कुछ अधिक परंपरागत है। उसके अनुसार वैश्विक रोजगारका लगभग 2.3 प्रतिशत हिस्सा, अर्थात लगभग 75 मिलियन नौकरियाँ, पूर्ण ऑटोमेशनके जोखिममें हैं।साथही, श्रम शोधकर्ताओंने यह भी नोट कियाहैकि बड़े पैमानेपर अचानक होनेवाले ले-ऑफ्सकी संभावना कम है। इसके बजाय एंट्री-लेवल व्हाइट-कॉलर कर्मचारियों तथा केवल शारीरिक श्रमपर आधारित "grunt work" करनेवाले कर्मचारियोंकी भर्ती धीमी पड़सकतीहै।फिरभी कुछ डूम्सडे भविष्यवक्ता अभीसे यह भविष्यवाणी करने लगेहैंकि AI अंततः मानवतापर कैसे हावी होजाएगा!क्या AI कभी मानवोंको पीछे छोड़सकताहै? निश्चितरूपसे, कुछ विशिष्ट भूमिकाओंमें हाँ।AI प्रणालियोंको ऐसे विशाल ज्ञानभंडारपर प्रशिक्षित कियाजाताहै, जिसे कोई भी एक अकेला मानव कभी पूरी तरह आत्मसात नहीं करसकता। उनमें विशाल मात्रामें डेटा इनजेस्ट करने, उसे प्रोसेस करने, और ऐसी गति से परिणाम देनेकी क्षमता होतीहै जिसकी कल्पना भी मनुष्य नहीं करसकता।लेकिन क्या इससे वे मानवोंके बराबर होजातीहैं, या उनसे श्रेष्ठ बनजातीहैं?मुझे ऐसा नहीं लगताहै। कमसेकम अपने वर्तमान स्वरूपमें तो बिल्कुल नहीं। आजके रूपमें वे अत्यधिक यांत्रिक हैं। वे उन कार्योंको संपन्न करतीहैं जो मानवोंको अत्यंत उबाऊ या थकाऊ लगतेहैं, और यह सब वे विशाल कंप्यूटिंग शक्तिका उपयोगकरतेहुए बिना किसी सचेत उद्देश्यके करतीहैं।आजका AI पैटर्न्सके आधारपर सही उत्तरका अनुमान लगानेमें बहुत अच्छा काम करसकताहै। लेकिन जैसा मैंने पिछले एपिसोड्समें चर्चा कीथी, वह वास्तवमें यह "समझ" नहीं सकताकि वह किस चीजका निष्कर्ष निकालरहाहै। न ही उसके पास अपने किसी भी कार्यको करनेकी कोई वास्तविक "मोटिवेशन" होतीहै। उसका मानवोंसे आगे निकलनेका कोई उद्देश्य नहीं है। और वर्तमानमें वह उसकेलिए तैयार भी नहीं है।उसका ज्ञान चाहे जितना विशाल क्योंनहो, वह केवल उन जानकारियोंतक सीमित है जो ...
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  • [Hindi] क्या ए-आई प्रणालियों में वास्तव में चेतना है?
    2026/06/20
    [Preview books] [Borrow books] [Pause] ब्लेक लेमोइन नामक गूगल के एक पूर्व कर्मचारी के लिए यही प्रश्न उनकी नौकरी और प्रतिष्ठा खोने का कारण बना। संभवतः आपने इसके बारे में पढ़ा होगा।2022 में, जब वे गूगल की एआई प्रणालियों में से एक 'लैम्डा' का परीक्षण कर रहे थे, तब ब्लेक को लगा कि उस एआई में चेतना है! वे यहीं नहीं रुके। इसके बजाय, उन्होंने उस एआई के अधिकारों के लिए संघर्ष करना शुरू कर दिया। परिणामस्वरूप उन्हें अपनी नौकरी गंवानी पड़ी।AI सिस्टम की चेतना के बारे में बात करने से पहले, आइए सबसे पहले अपने खुद के चेतन अनुभव को समझें। हम चेतन अनुभव कैसे प्राप्त करते हैं, यह प्रश्न लंबे समय से तंत्रिका-विज्ञानियों के लिए एक पहेली बना हुआ था। जब फंक्शनल एम-आर-आई स्कैनर जैसे आधुनिक उपकरणों का आविष्कार हुआ, तब तंत्रिका-विज्ञानी मानव-मस्तिष्क की विभिन्न ग्रहण प्रक्रियाओं को समझाने में सक्षम हुए। वे मस्तिष्क के उन सटीक क्षेत्रों की पहचान करसके जो किसी विशेष प्रकार की अनुभूति के लिए उत्तरदायी होते हैं।लेकिन प्रारंभ में यह स्पष्ट नहीं था कि मस्तिष्क के विभिन्न भागों में फैले हुए जटिल अनुभव किस प्रकार एकीकृत होकर साकार होते हैं।उदाहरण के लिए, मान लीजिए कि आप एक वृक्ष को देखते हैं। आप तुरंत पहचान लेते हैं कि वह किसी विशेष प्रजाति का वृक्ष है। तंत्रिका-विज्ञानी मस्तिष्क के उन विशिष्ट क्षेत्रों को इंगित करसकते थे जो वृक्ष की पत्तियों, उसके फलों, उसके तने आदि की पहचान करते हैं।लेकिन आपका वास्तविक अनुभव मस्तिष्क के अनेक क्षेत्रों द्वारा संसाधित होता है। फिर भी मस्तिष्क में ऐसा कोई एक विशिष्ट क्षेत्र नहीं है जो वृक्ष की संपूर्ण छवि को एकत्रित करके आपको यह अनुभव कराए कि, 'अहा! यह आम का पेड़ है!'तंत्रिका-विज्ञानियों ने इस समस्या को 'बाइंडिंग प्रॉब्लम' कहा। अर्थात्, मस्तिष्क के विभिन्न भागों में बिखरी हुई सूचनाओं को एकीकृत करके उन्हें परस्पर जोड़ने की समस्या।1900 के दशक के उत्तरार्ध में, अमेरिकी तंत्रिका-विज्ञानी बर्नार्ड बार्स ने इस घटना की व्याख्या करने के लिए 'ग्लोबल वर्कस्पेस थ्योरी' नामक सिद्धांत प्रस्तुत किया। वह सिद्धांत काफी हद तक रूपकात्मक था।बार्स के रूपक की काफी आलोचना हुई। क्योंकि उससे ऐसा प्रतीत होता था मानो अनुभव करने ...
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  • [Hindi] क्या आजकी AI प्रणालियाँ सचमुच कुछ समझतीहैं?
    2026/06/13
    [Preview books] [Borrow books] [Pause] जिस किसीने भी ChatGPT, Gemini, या ऐसी किसी अन्य कृत्रिम बुद्धिमत्ता के साथ काम कियाहै, उसे शायद ऐसा लगाहोगा कि वे वास्तवमें समझतीहैं। एक AI हमारे साथ लगभग एक सामान्य इंसानकी तरह संवाद करतीहै। वह मज़ाक करतीहै, और हमारे व्यंग्यपूर्ण कथनों तथा छोटी-मोटी आपत्तियोंपर भी इंसानोंकी तरह प्रतिक्रिया देतीहै।यदि आप उससे अपने व्याख्यानके लिए प्रस्तुति स्लाइड तैयार करनेके लिए कहें, तो वह शायद आपसे भी बेहतर काम करदे। मैंने तो यहभी सुनाहै कि बहुतसे विद्यार्थी अपने स्कूल और कॉलेजके assignment भी AI से ही करवाने लगेहैं।तो फिर, क्या यह स्पष्ट नहींहै कि वे चीज़ोंको समझतीहैं? बिल्कुल नहीं। इसका कारण यहहै कि आजकी AI प्रणालियाँ जिस प्रकार बनाई गईहैं, वही ऐसा है। वास्तवमें उनमें किसी भी चीज़को समझनेकी क्षमता ही नहीं होती।एक AI मूल रूपसे यही करतीहै—आपने जो कहाहै, या उसे पहले जो सिखायागयाहै, उसके आधारपर वह केवल pattern matching करतीहै और यह अनुमान लगातीहै कि आपके प्रश्नका सबसे उपयुक्त उत्तर क्या होसकताहै।वैसे यह उतनी बुरी बात भी नहींहै। आखिर हममेंसे बहुतसे लोग भी यही करतेहैं। अधिकांश लोग pattern matching और अनुमान लगानेवाली मशीनोंकी तरह ही काम करतेहैं। हम किसी बातको गहराईसे समझनेका प्रयास बहुत कम करतेहैं।तो फिर, वास्तविक समझमें क्या-क्या शामिल होताहै?बहुत सरल शब्दोंमें कहें, तो इसका अर्थ है किसी नए शब्दको किसी ऐसी चीज़से जोड़ना जिसे हम पहलेसे जानतेहैं। या दूसरे शब्दोंमें, किसी नए शब्दका अर्थ उस चीज़की सहायतासे समझना जो हमें पहलेसे परिचित है।लेकिन यह जुड़ाव केवल शब्दोंतक सीमित नहीं होता। यह उससे कहीं आगे जासकताहै।उदाहरणके लिए, जैसे ही कोई "बिल्ली" शब्द कहताहै, हमारा मन उस शब्दको एक मुलायम, रोएँदार जीवसे जोड़ देताहै, जिसके चार पैर होतेहैं, एक लंबी पूँछ होतीहै, और जो कभी-कभी गुनगुनाने जैसी आवाज़ निकालतीहै। वास्तवमें हम किसी शब्दको उस जीवके पूरे विवरणसे जोड़तेहैं जिसका वह प्रतिनिधित्व करताहै।हमारी समझ केवल दृश्य अनुभवतक भी सीमित नहीं होती।यदि आप कभी दक्षिण-पूर्व एशियाके कुछ देशोंमें गएहों, तो केवल "ड्यूरियन" शब्द सुनतेही अनेक बातें आपके मनमें आसकतीहैं—उसकी तीखी गंध, जो लगभग मतली पैदा करसकतीहै, और फिरभी उसका ...
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  • [Hindi] हमारी भावनाओं और अनुभूतियोंका कारण क्या है?
    2026/06/06
    [Preview books] [Borrow books] [Pause] भावनाएँ और अनुभूतियाँ केवल जीवित प्राणियोंमें पाईजानेवाली विशिष्ट विशेषताएँ मानीजातीहैं। निर्जीव वस्तुओंमें वे नहीं होतीं। वास्तवमें, उन्हें अक्सर जीवनके प्रमुख लक्षणोंमेंसे एक मानाजाताहै। तो फिर उनका कारण क्या है?यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदनके तंत्रिका-विज्ञानियोंकी एक टीमने इस विषयपर कुछ अध्ययन किए। जब हमारेभीतर भावनाएँ और अनुभूतियाँ उत्पन्न होतीहैं, तब हमारे मस्तिष्कमें होनेवाले परिवर्तनोंका अध्ययनकरनेकेलिए उन्होंने फंक्शनल एमआरआई (f-MRI) स्कैनर जैसे अत्याधुनिक उपकरणोंका उपयोग किया। उन्होंने कुछ सरल प्रयोग किए। कुछ महिला स्वयंसेवकोंको बच्चोंकी तस्वीरें दिखाई गईं। इनमेंसे कुछ तस्वीरें उनके अपने बच्चोंकी थीं, जबकि कुछ ऐसे बच्चोंकी थीं जिन्हें वे जानती थीं, लेकिन जिनसे उनका कोई रक्त-संबंध नहीं था।f-MRI स्कैनरोंकी सहायता से उन्होंने उन महिलाओंके मस्तिष्कका अवलोकन किया। उन्होंने दो बातें पहचानीं। जब ये प्रतिभागी अपने बच्चोंकी तस्वीरें देख रही थीं, तब उनके मस्तिष्कके कुछ भाग सक्रिय होरहेथे, जबकि कुछ अन्य भाग निष्क्रिय होरहेथे, अर्थात दबाए जारहेथे।यह सक्रियता बच्चोंके प्रति माँके प्रेमकी भावना को व्यक्त कररहीथी, जबकि निष्क्रियता उन बच्चोंकी कमियोंके प्रति एक प्रकारकी उदासीनताको दर्शारहीथी। दूसरे शब्दोंमें, वे अपने बच्चोंको उनकी त्रुटियों और कमियोंके बावजूद प्रेम करती थीं।लेकिन जब उन्हें ऐसे बच्चोंकी तस्वीरें दिखाई गईं जिन्हें वे जानती तो थीं, पर जो उनके अपने बच्चे नहीं थे, तब वहाँका दृश्य अलग था।वैज्ञानिकोंने अनुमान लगाया कि माताओंके इस विशेष व्यवहारका कारण मस्तिष्कमें स्रावित होनेवाले कुछ न्यूरो-हार्मोन (neuro-hormones) तथा मस्तिष्कके रिवॉर्ड सेंटरमें उपस्थित कुछ विशिष्ट रिसेप्टरोंकी उनकी प्रति प्रतिक्रिया होसकतीहै।उन्होंने प्रयोगशालाके पशुओंको ऐसे रसायन दिए जो इन हार्मोनोंके प्रभावको समाप्त करदेतेथे। ऐसा करनेपर माँ चूहियाँ अपनी संतानोंके प्रति स्वाभाविक वात्सल्य और पालन-पोषणकी भावनासे पूरीतरह मुक्त होगईं। इससे स्पष्ट था कि वे हार्मोन उन भावनाओंकेलिए उत्तरदायी थे।इन्हीं वैज्ञानिकोंने प्रेमियोंके बीच उत्पन्न होनेवाली ...
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