『विचारमंथन : Dr.King, Swami Satyapriya』のカバーアート

विचारमंथन : Dr.King, Swami Satyapriya

विचारमंथन : Dr.King, Swami Satyapriya

著者: Dr. King
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जीवन को गहराई से समझने के लिए विज्ञान, दर्शन और आध्यात्मिकता का संगम। बेहतर और उद्देश्यपूर्ण जीवन के लिए पाएं प्रेरक विचार और सकारात्मक सोच।(c) Dr. King スピリチュアリティ
エピソード
  • [Hindi] ॐकार का चमत्कार (भाग 4): अनेक नहीं, केवल एक ही चेतना है!
    2026/07/25
    [Preview books] [Borrow books] [Pause] पिछले कुछ एपिसोडों में हमने चेतना के बारे में चर्चा की। हमने चेतना की चार अवस्थाओं—जाग्रत अवस्था, स्वप्न अवस्था, सुषुप्ति अवस्था और तुरीय की अवर्णनीय अवस्था—के बारे में बात की। सभी जीवधारी अलग-अलग समय पर इन चार अवस्थाओं में से किसी-न-किसी एक का अनुभव करते हैं।हमारी यह चर्चा भारत के प्राचीन उपनिषदों में से एक, माण्डूक्य उपनिषद, पर आधारित थी।पिछले एपिसोड के अंत में मैंने संकेत दिया था कि भारत के अनेक अद्वैत दार्शनिक इन चेतना-अवस्थाओं के बारे में एक भिन्न दृष्टिकोण रखते हैं। इस एपिसोड में मैं गौड़पाद द्वारा अपनी प्रसिद्ध माण्डूक्य कारिका—अर्थात् माण्डूक्य उपनिषद पर लिखी गई उनकी व्याख्या—में प्रस्तुत वैकल्पिक दृष्टिकोण का संक्षेप में वर्णन करूँगा।गौड़पाद कौन थे?गौड़पाद अद्वैत परंपरा के मूल दार्शनिक थे। उनका समय छठी शताब्दी ईस्वी का माना जाता है। वे प्रसिद्ध अद्वैत दार्शनिक शंकराचार्य के परमगुरु (गुरु के गुरु) थे।गौड़पाद ने क्या कहा? गौड़पाद के अनुसार, माण्डूक्य उपनिषद में वर्णित चेतना की पहली तीन अवस्थाएँ केवल आभास हैं; वे वास्तविक नहीं हैं। वास्तविक अवस्था केवल तुरीय है, और वही अकेली अन्य तीन अवस्थाओं के रूप में प्रकट होती है।यह समझानेकेलिए कि चेतना की एकमात्र अवस्था अन्य तीन अवस्थाओं के रूप में कैसे दिखाई देती है, गौड़पाद अनेक उपमाएँ देते हैं।स्वप्न की उपमा:जब कोई व्यक्ति स्वप्न देखता है, तब वह अनेक लोगों, अनेक स्थानों और अनेक घटनाओंकोदेखताहै। लेकिन वास्तव में वे सभी एक ही मन की रचना होते हैं—अर्थात् स्वप्न देखने वाले के मन की। उसी प्रकार गौड़पाद कहते हैं कि एक ही सार्वभौमिक चेतना अनेक जीवों के अस्तित्व का आभास उत्पन्न करती है, जिनमें से प्रत्येक किसी-न-किसी विशेष चेतना-अवस्था में प्रतीत होता है।इन जीवों का कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं है। वे स्वप्न में दिखाई देने वाले दृश्यों के समान हैं। स्वप्न समाप्त होते ही उसके सभी दृश्य और वस्तुएँ लुप्त हो जाती हैं, क्योंकि उनका वास्तव में कभी अस्तित्व था ही नहीं। वे केवल अस्तित्ववान प्रतीत होते थे। इसी प्रकार वास्तविकता में दिखाई देने वाली यह विविधता भी केवल प्रतीत होती है।यह समझानेकेलिए कि केवल एक चेतना ...
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  • [Hindi] ॐकार का चमत्कार — चेतना की अवर्णनीय चौथी अवस्था।
    2026/07/18
    [Preview books] [Borrow books] [Pause] पिछले एपिसोड में हमने अपने प्राचीन भारतीय दार्शनिकों द्वारा वर्णित चेतना की तीन अवस्थाओं पर चर्चा की थी। अपनी चर्चा के लिए हमने उपनिषदों में से एक, माण्डूक्य उपनिषद को आधार बनाया था।यह उपनिषद चेतना की तीन अवस्थाओं—जाग्रत अवस्था, स्वप्न अवस्था और सुषुप्ति अवस्था—के बारे में बताता है। ये वही तीन अवस्थाएँ हैं जिन्हें हम सभी जीवों में प्रतिदिन देखते हैं। इसके बाद यह 'तुरीय' नामक चौथी अवस्था का वर्णन करता है।आख़िर यह तुरीय अवस्था क्या है? जब भी किसी नई अवधारणा का परिचय कराया जाता है, तो उसकी तुलना पहले से ज्ञात बातों से करना, या उससे उसका अंतर बताना स्वाभाविक होता है। यह उपनिषद भी सबसे पहले यही करता है।उपनिषद कहता है कि तुरीय अवस्था, जाग्रत अवस्था जैसी नहीं है। जाग्रत अवस्था में हमारी चेतना बाहरी संसार के साथ व्यवहार करती है। लेकिन तुरीय अवस्था में ऐसा कोई बाहरी व्यवहार नहीं होता।उपनिषद यह भी कहता है कि यह चेतना किसी भी प्रकार के स्वप्न उत्पन्न नहीं करती। अर्थात् यह स्वप्न अवस्था से भी भिन्न है।तो क्या तुरीय ऐसी अवस्था हो सकती है जो आधी स्वप्न और आधी जाग्रत हो? उपनिषद इस संभावना को भी अस्वीकार कर देता है।ऐसी स्थिति में हमारे सामने केवल एक ही संभावना बचती है कि तुरीय, गहरी नींद की तरह चेतना की पूरी तरह सुप्त अवस्था होगी। गहरी नींद में हम ऐसा ही देखते हैं। लेकिन उपनिषद इस संभावना को भी नकार देता है।साथ ही उपनिषद यह भी कहता है कि तुरीय न तो ऐसी शून्य अवस्था है जिसमें कोई चेतना ही न हो, और न ही ऐसी अवस्था है जिसमें किसी विशेष वस्तु का ज्ञान हो।उपनिषद इन सभी बातों को संक्षेप में इस प्रकार कहता है—"न अन्तःप्रज्ञं, न बहिःप्रज्ञं, न उभयतःप्रज्ञं, न प्रज्ञानघनं, न प्रज्ञं, न अप्रज्ञं।"तो फिर वास्तव में तुरीय क्या है?यदि हमें किसी वस्तु का वर्णन 'यह ऐसा है' कहकर करना हो, तो उसका इन्द्रियों द्वारा ग्रहण किया जा सकना आवश्यक है। लेकिन उपनिषद कहता है कि तुरीय ऐसी कोई वस्तु नहीं है जिसे इन्द्रियों से ग्रहण किया जा सके।कभी-कभी किसी वस्तु का वर्णन यह बताकर किया जा सकता है कि उसका उपयोग किस काम के लिए होता है। लेकिन उपनिषद के अनुसार तुरीय ऐसी कोई वस्तु नहीं है जिसका किसी कार्य के लिए उपयोग ...
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  • [Hindi] ॐकार का जादू: चेतना की तीन अवस्थाएँ।
    2026/07/11
    [Preview books] [Borrow books] [Pause] पिछले एपिसोड में हम चर्चा कर रहे थे कि प्राचीन भारतीय चेतना की अवधारणा को किस प्रकार देखते थे। एक विशिष्ट उदाहरण के रूप में मैंने उपनिषदों में से एक, 'माण्डूक्य उपनिषद' को लिया था। माण्डूक्य उपनिषद अथर्ववेद का एक भाग है।यह छोटा-सा उपनिषद बताता है कि परम सत्य चेतना की चार अवस्थाओं के माध्यमसे किस प्रकार प्रकट होता है। वह उस परम सत्य को 'ॐकार' कहता है। यह चेतना की चार अवस्थाओं को जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति और तुरीय के रूपमें पहचानता है।ये अवस्थाएँ ॐकार द्वारा धारण किए गए असंख्य रूपों में विद्यमान हैं। जैसा कि हमने पहले चर्चा की थी, यह निश्चित रूपसे संभव है क्योंकि ॐकार देश और काल से परे है। ॐकार के विभिन्न रूप ही पूरे ब्रह्मांडमें व्याप्त जीव हैं। चूँकि वे रूप देश और काल के नियमों के अधीन हैं, इसलिए वे एक समयमें केवल एक ही अवस्था में रहसकतेहैं।इस एपिसोड में हम इन चार अवस्थाओं में से पहली तीन अवस्थाओं के बारेमें जानेंगे। सबसे पहली अवस्था जागने की अवस्था है, जिसे चेतना की 'जाग्रत' अवस्था कहा जाता है। इस अवस्था में जीव अपने शरीर के बाहर की दुनिया के साथ संपर्क करता है।वह अपने शरीर के बाहर की दुनिया से जानकारी एकत्र करने केलिए अपनी पाँच ज्ञानेन्द्रियों, जैसे आँखों और कानों, का उपयोग करता है। फिर वह उस जानकारी को अपने मन, बुद्धि, अहंकार और अन्य मानसिक क्षमताओं की सहायता से संसाधित करता है।जानकारी संसाधित होजानेकेबाद शरीर बाहरी वस्तुओं के साथ क्रिया करनेकेलिए अपने पाँच कर्मेन्द्रियों, जैसे हाथों और पैरों, का उपयोग करता है। प्राण जैसी पाँच जीवन-शक्तियाँ इस पूरी प्रक्रिया में शरीर और मन को सहारा देती हैं।मूल रूपसे जाग्रत वह चेतना की अवस्था है जो शरीर के बाहर स्थित स्थूल वस्तुओं के साथ व्यवहार करती है।उपनिषद इसका वर्णन इस प्रकार करता है।तंत्रिका-विज्ञान इसे किस प्रकार देखता है?तंत्रिका-विज्ञान की शब्दावली में इसे Access Consciousness कहा जाता है। तंत्रिका-विज्ञानी इस बातको काफी हदतक समझ चुके हैं कि शरीर और मस्तिष्क इस प्रकार की चेतना को किस प्रकार संभालते हैं।मस्तिष्क में विभिन्न विशिष्ट क्षेत्र होते हैं जो बाहरी ज्ञानेन्द्रियों से आनेवाली जानकारी को संसाधित करते हैं। जानकारी ...
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