『[Hindi] 'द' का रहस्य: गरजते बादलकी आवाज़में छिपी है जीवनकी सीख!』のカバーアート

[Hindi] 'द' का रहस्य: गरजते बादलकी आवाज़में छिपी है जीवनकी सीख!

[Hindi] 'द' का रहस्य: गरजते बादलकी आवाज़में छिपी है जीवनकी सीख!

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[Preview books] [Borrow books] [Pause] क्या आपको वह आवाज़ सुनाई दी?हाँ, आपने बिल्कुल सही पहचाना। वह आकाशमें गरजते हुए बादलोंकी गड़गड़ाहटकी आवाज़ है। लेकिन वह गड़गड़ाहट सिर्फ़ आवाज़ नहीं कर रही, बल्कि कुछ कह रही है!आप सोच सकते हैं कि मैं कोई मूर्खतापूर्ण या अजीब बात कह रहा हूँ। लेकिन ऐसा बिल्कुल नहीं है। अगर हम भारतके प्राचीन धर्मग्रंथोंमें से एक, 'बृहदारण्यक उपनिषद्'की बातोंपर ध्यान दें, तो हमें समझमें आता है कि प्रकृतिके उस शब्दके पीछे एक बहुत गहरा संदेश छिपा है।तो फिर, वह उपनिषद् हमें क्या बताता है? यह एक सुंदर, छोटी-सी कहानीसे शुरू होता है। यह कहानी सुननेमें भले ही काफ़ी हास्यपूर्ण लगे, लेकिन इसका गहरा अर्थ बहुत गंभीर है और हर किसीको सोचनेपर मजबूर कर देता है।कहानीके अनुसार, एक बार तीन जीव ज्ञान और मार्गदर्शनकी खोजमें भगवानके पास गए। उन तीनोंमेंसे एक मनुष्य था, दूसरा देवता था और तीसरा राक्षस था। अपनी-अपनी अलग प्रकृतिवाले इन तीनों जीवोंने भगवानसे उनका मार्गदर्शन करनेकी प्रार्थना की।सबसे पहले मनुष्य भगवानके सामने खड़ा होकर बोला,"स्वामी, मुझे जीवनमें किस बातका पालन करना चाहिए? मुझे कोई उपदेश दीजिए।"इसके उत्तरमें भगवानने केवल एक अक्षर कहा:फिर भगवानने उसकी ओर देखकर पूछा:"क्या तुम्हें समझमें आया कि मैंने क्या कहा?"सच कहें तो मनुष्य उस एक अक्षरका पूरा अर्थ तुरंत नहीं समझ सका। फिर भी अपने अहंकार और आत्मविश्वासके साथ उसने कहा:"हाँ स्वामी, मुझे बिल्कुल समझमें आ गया। आप कह रहे हैं कि मुझे 'द' अक्षरसे शुरू होनेवाले एक सूत्रका पालन करना चाहिए। यहाँ 'द' का अर्थ है 'दान'। अपने पास जो कुछ है, उसे दूसरोंको देना। इसलिए आप मुझे सिखा रहे हैं कि मुझे जीवनमें दान-धर्मका अभ्यास करना चाहिए, है न?"भगवान मुस्कुराए और बोले:"हाँ, तुमने बिल्कुल सही समझा है।"यहाँ हमें एक बातपर ध्यान देना चाहिए। मनुष्य स्वभावसे ही बहुत कंजूस होता है। उसकी लालचकी कोई सीमा नहीं होती। कितना भी मिल जाए, उसे कभी पर्याप्त नहीं लगता और वह धन इकट्ठा करता ही जाता है। अपने पास मौजूद धनको दूसरोंके साथ बाँटने और कठिनाईमें पड़े ज़रूरतमंदोंको दान देनेके लिए वह कभी आसानीसे आगे नहीं आता। मनुष्यके इसी मूल स्वभावकी कमजोरीके आधारपर उसने भगवानके उपदेशका अर्थ यह समझा ...
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