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[Hindi] तुरीय प्रज्ञा का वास्तविक चमत्कार

[Hindi] तुरीय प्रज्ञा का वास्तविक चमत्कार

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[Preview books] [Borrow books] [Pause] पिछले कुछ एपिसोडों में हमने दर्शन की कुछ अत्यंत गहन अवधारणाओं की यात्रा की थी। हमने चर्चा की थी कि प्राचीन भारतीय ऋषि प्रज्ञा के बारे में क्या दृष्टिकोण रखते थे। उस चर्चा का सबसे महत्वपूर्ण भाग था प्रज्ञा की वह आश्चर्यजनक और मन को विस्मित कर देने वाली अवस्था, जिसे तुरीय कहा जाता है और जो अनुभव-आधारित समस्त तर्क से परे प्रतीत होती है।आधुनिक और तर्कप्रधान मन के लिए तुरीय की यह अवधारणा एक सुंदर कल्पना जैसी लग सकती है। यह एक काव्यमय, आदर्शवादी और अवास्तविक विचार भी प्रतीत हो सकती है। इसलिए कोई संशयवादी पूछ सकता है, "क्या वास्तवमें कोई इस अवस्था में जीया था? या यह केवल प्राचीन मनोविज्ञान की एक काल्पनिक कहानी है?"आज मैं आपके सामने यह तर्क रखना चाहता हूँ कि तुरीय की यह अवस्था केवल कल्पना नहीं है। संभव है कि हम इसे वैज्ञानिक रूपसे सिद्ध न करसकें। लेकिन हम उन लोगों के जीवन की प्रामाणिक घटनाओं का अध्ययन अवश्य करसकतेहैं, जिन्होंने इस अवस्था में जीवन बिताया। ऐसे लोग जो सदियों पहले नहीं, बल्कि कुछ ही दशक पहले हमारे बीच रहे। और जिनके जीवन की घटनाएँ बिना किसी अतिशयोक्ति या महिमामंडन के दर्ज की गई हैं। इसी उद्देश्य से मैं दक्षिण भारत के एक प्रसिद्ध संत के जीवन का उदाहरण लेना चाहता हूँ। मैं यहाँ किसी पुस्तक या स्तुतिगान का सहारा नहीं ले रहा हूँ। मेरा आधार केवल उन साधारण लोगों के अनुभव हैं, जिन्होंने उनके साथ जीवन बिताया और उन्हें अपनी आँखों से देखा। उन लोगों का कोई स्वार्थ नहीं था और न ही झूठ बोलने का कोई कारण।सबसे पहले यह जानकारी मुझे कुछ वृद्ध महिलाओं से मिली, जो उस संत के जीवनकाल में जीवित थीं। वे नहीं जानती थीं कि वे कौन थे। उन्हें यह भी पता नहीं था कि वे कहाँ से आए थे। वह संत दक्षिण भारत के तटीय गाँवों में पूर्णतः दिगम्बर होकर विचरण करते थे।वे लगभग किसी से बात नहीं करते थे, इसलिए उपदेश देने का तो प्रश्न ही नहीं उठता था। उन्होंने कभी किसी से भोजन भी नहीं माँगा। कभी-कभी लोग उन्हें कूड़ेदान में फेंका हुआ भोजन खाते हुए देखते थे। इसलिए लगभग सभी लोग उन्हें पागल समझते थे।गली के बच्चे उनका मज़ाक उड़ाते थे। यहाँ तक कि उन पर पत्थर भी फेंकते थे। लेकिन वे कभी प्रतिक्रिया नहीं देते थे। कभी-कभी उन ...
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