सुरता : साहित्य की धरोहर के इस विशेष अंक में प्रस्तुत है व्याकरणविद्, कहानीकार एवं समीक्षक डॉ. विनोद कुमार वर्मा की अत्यंत संवेदनशील हिंदी लघुकथा "गुल्लक"।
यह कहानी एक साधारण निम्न-मध्यमवर्गीय परिवार की असाधारण संवेदनाओं की कथा है। महीने के अंतिम दिन आर्थिक अभाव से जूझते पिता और उनकी दस वर्षीय बेटी अंशु के बीच घटित एक छोटी-सी घटना प्रेम, त्याग, संस्कार और पारिवारिक आत्मीयता का ऐसा चित्र प्रस्तुत करती है, जो सीधे हृदय को स्पर्श करता है।
इस एपिसोड में केवल कहानी का वाचन ही नहीं, बल्कि उस पर प्रतिष्ठित साहित्यकारों और समीक्षकों के विचार भी शामिल हैं।
सुप्रसिद्ध कवयित्री वसन्ती वर्मा ने इस कहानी को भारतीय परिवारों के श्रेष्ठ संस्कारों का जीवंत चित्र बताया है।
कवयित्री ज्योति गभेल ने कहा है कि जीवन में एक ऐसी गुल्लक अवश्य होनी चाहिए, जिसमें नेकी, रिश्ते और सच्चाई संचित हों।
सुप्रसिद्ध समीक्षक मणिशंकर दुबे 'रामरागी' के अनुसार यह लघुकथा संग्रह नहीं, बल्कि अर्पण की संस्कृति का उत्सव है और यह संदेश देती है कि वास्तविक धन वही है जिसे प्रेमपूर्वक दूसरों के लिए समर्पित किया जाए।
साथ ही सुभाष मित्तल, डोरेलाल कैवर्त तथा राम साशोनी की प्रतिक्रियाएँ भी इस रचना की संवेदनात्मक शक्ति और जीवन-मूल्यों को रेखांकित करती हैं।
यदि आपको परिवार, रिश्तों, संवेदनाओं और मूल्यपरक साहित्य से प्रेम है, तो यह एपिसोड निश्चित रूप से आपके मन को स्पर्श करेगा।
सुनिए, साझा कीजिए और साहित्य की इस संवेदनशील यात्रा का हिस्सा बनिए।
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