エピソード

  • 'मेडल' : ईमानदारी, कर्तव्य और सम्मान की प्रेरक कहानी
    2026/07/16

    क्या आज के समय में ईमानदारी का सम्मान होता है? क्या सत्य और कर्तव्यनिष्ठा अंततः अपना उचित स्थान प्राप्त करते हैं?

    'सुरता: साहित्य की धरोहर' के इस विशेष एपिशोड में प्रस्तुत है सुप्रसिद्ध व्याकरणविद्, कहानीकार एवं समीक्षक डॉ. विनोद कुमार वर्मा की प्रेरक हिन्दी कहानी "मेडल" का सस्वर वाचन।

    यह कहानी एक ऐसे युवा पुलिस अधिकारी हेमलाल मरकाम की है, जो बार-बार स्थानांतरण, राजनीतिक दबाव और कठिन परिस्थितियों के बावजूद अपने कर्तव्य से समझौता नहीं करता। मुख्यमंत्री की निजी गाड़ी का भी नियमों के अनुसार चालान करने वाला यह अधिकारी अंततः अपनी ईमानदारी, निष्पक्षता और कर्तव्यनिष्ठा के लिए भारतीय पुलिस पदक से सम्मानित होता है।

    एपिशोड में कहानी के साथ-साथ प्रतिष्ठित साहित्यकारों एवं समीक्षकों की समीक्षाएँ और प्रतिक्रियाएँ भी सम्मिलित हैं—

    • पद्मलोचन शर्मा — जिन्होंने कहानी को "सत्य परेशान हो सकता है, पराजित नहीं" के सिद्धांत का सशक्त उदाहरण बताया।
    • डॉ. भावना एन. सावलिया (गांधीनगर) — जिनके अनुसार यह कहानी युवा पीढ़ी में साहस, ईमानदारी और कर्तव्यबोध का संचार करती है।
    • मणिशंकर दुबे 'रामरागी' — जिन्होंने इसकी तुलना मुंशी प्रेमचंद की कालजयी कहानी "नमक का दरोगा" से करते हुए इसे सत्ता पर कर्तव्य की विजय की कथा कहा।
    • पवन जैन — जिन्होंने हिन्दी कथा में स्थानीय भाषा के प्रभावी प्रयोग की सराहना की।

    यदि आपको प्रेरक साहित्य, जीवन-मूल्यों पर आधारित कहानियाँ और साहित्यिक विमर्श पसंद हैं, तो यह एपिशोड अवश्य सुनें।

    सुरता: साहित्य की धरोहर — जहाँ शब्द केवल पढ़े नहीं जाते, बल्कि जीवन को दिशा भी देते हैं।

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    12 分
  • क्या सच्ची संपत्ति पैसा है या परिवार का प्रेम? | गुल्लक | कहानी वाचन एवं चर्चा
    2026/07/10

    सुरता : साहित्य की धरोहर के इस विशेष अंक में प्रस्तुत है व्याकरणविद्, कहानीकार एवं समीक्षक डॉ. विनोद कुमार वर्मा की अत्यंत संवेदनशील हिंदी लघुकथा "गुल्लक"

    यह कहानी एक साधारण निम्न-मध्यमवर्गीय परिवार की असाधारण संवेदनाओं की कथा है। महीने के अंतिम दिन आर्थिक अभाव से जूझते पिता और उनकी दस वर्षीय बेटी अंशु के बीच घटित एक छोटी-सी घटना प्रेम, त्याग, संस्कार और पारिवारिक आत्मीयता का ऐसा चित्र प्रस्तुत करती है, जो सीधे हृदय को स्पर्श करता है।

    इस एपिसोड में केवल कहानी का वाचन ही नहीं, बल्कि उस पर प्रतिष्ठित साहित्यकारों और समीक्षकों के विचार भी शामिल हैं।

    सुप्रसिद्ध कवयित्री वसन्ती वर्मा ने इस कहानी को भारतीय परिवारों के श्रेष्ठ संस्कारों का जीवंत चित्र बताया है।

    कवयित्री ज्योति गभेल ने कहा है कि जीवन में एक ऐसी गुल्लक अवश्य होनी चाहिए, जिसमें नेकी, रिश्ते और सच्चाई संचित हों।

    सुप्रसिद्ध समीक्षक मणिशंकर दुबे 'रामरागी' के अनुसार यह लघुकथा संग्रह नहीं, बल्कि अर्पण की संस्कृति का उत्सव है और यह संदेश देती है कि वास्तविक धन वही है जिसे प्रेमपूर्वक दूसरों के लिए समर्पित किया जाए।

    साथ ही सुभाष मित्तल, डोरेलाल कैवर्त तथा राम साशोनी की प्रतिक्रियाएँ भी इस रचना की संवेदनात्मक शक्ति और जीवन-मूल्यों को रेखांकित करती हैं।

    यदि आपको परिवार, रिश्तों, संवेदनाओं और मूल्यपरक साहित्य से प्रेम है, तो यह एपिसोड निश्चित रूप से आपके मन को स्पर्श करेगा।

    सुनिए, साझा कीजिए और साहित्य की इस संवेदनशील यात्रा का हिस्सा बनिए।

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    7 分
  • श्रद्धांजलि : पंडवानी की अमर स्वर-सम्राज्ञी डॉ. तीजन बाई
    2026/07/08

    पंडवानी की अमर स्वर-सम्राज्ञी, पद्म विभूषण से सम्मानित डॉ. तीजन बाई को "सुरता : साहित्य की धरोहर" की विनम्र श्रद्धांजलि।

    5 जुलाई को 70 वर्ष की आयु में उनके निधन के साथ भारतीय लोककला और छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक परंपरा ने अपनी एक अमूल्य धरोहर खो दी। इस विशेष श्रद्धांजलि एपिसोड में हम उनके संघर्षपूर्ण जीवन, अद्वितीय कला-साधना, पंडवानी को विश्व मंच तक पहुँचाने में उनके ऐतिहासिक योगदान तथा भारतीय लोकसंस्कृति में उनके अविस्मरणीय स्थान का स्मरण करते हैं।

    तीजन बाई ने अपनी ओजस्वी वाणी, सशक्त अभिनय और अनुपम कथावाचन शैली से महाभारत की कथाओं को जन-जन तक पहुँचाया। उन्होंने सिद्ध किया कि लोककला केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि हमारी सांस्कृतिक अस्मिता और जीवन-मूल्यों की जीवंत अभिव्यक्ति है।

    आइए, इस विशेष प्रस्तुति के माध्यम से उस महान लोक साधिका को श्रद्धा, कृतज्ञता और अश्रुपूरित नमन अर्पित करें, जिनकी स्वर-गाथा सदैव भारतीय संस्कृति के आकाश में गूँजती रहेगी।

    भावभीनी श्रद्धांजलि।

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    25 分
  • सरस्वती सुता | डॉ. विनोद कुमार वर्मा की चर्चित लघुकथा
    2026/07/08

    सुरता : साहित्य की धरोहर के इस विशेष कहानी-वाचन अंक में प्रस्तुत है प्रख्यात व्याकरणविद्, कहानीकार एवं समीक्षक डॉ. विनोद कुमार वर्मा की बहुचर्चित लघुकथा "सरस्वती सुता"

    यह कहानी साहित्यिक पुरस्कारों की चयन-प्रक्रिया, विद्वानों के अहंकार, गुटबाजी और निष्पक्ष निर्णय की चुनौती पर तीखा व्यंग्य करती है। जब अनुभवी साहित्यकार निर्णय लेने में असमर्थ हो जाते हैं, तब नौ वर्ष की बालिका निकिता अपनी सहज बुद्धि, निष्पक्ष दृष्टि और तर्कपूर्ण विचार से ऐसा समाधान प्रस्तुत करती है, जो सभी को चकित कर देता है।

    इस रचना को साहित्य-जगत में व्यापक सराहना मिली है।

    समीक्षक मणिशंकर दुबे 'रामरागी' ने इसे "गागर में सागर" की परंपरा का उत्कृष्ट उदाहरण बताते हुए कहा है कि यह लघुकथा सच्चे ज्ञान, विनम्रता और निष्पक्षता का संदेश देती है।

    सुप्रसिद्ध साहित्यकार डॉ. चंद्रपाल सिंह यादव ने इसे कहानी-कला के नव्य मानदण्डों को स्पर्श करने वाली परिपूर्ण कहानी बताया है तथा इसकी कथावस्तु, शिल्प और निष्पक्ष चिंतन की विशेष प्रशंसा की है।

    इसके अतिरिक्त नरेन्द्र कौशिक, मोहन लाल कौशिक, डॉ. भावना सावलिया, सुरेश सिंह बैस (प्रयास प्रकाशन) तथा डॉ. सुषमा त्रिपाठी सहित अनेक साहित्यकारों ने इस कहानी को प्रेरणादायी, प्रवाहपूर्ण, शिक्षाप्रद और उत्कृष्ट रचना बताया है।

    यदि आपको यह प्रस्तुति पसंद आए तो वीडियो को Like, Share और Subscribe अवश्य करें तथा अपनी साहित्यिक प्रतिक्रिया टिप्पणी में लिखें।

    सुरता : साहित्य की धरोहर
    "शब्दों से संस्कृति, साहित्य से संवेदना।"

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    16 分
  • डॉ. विनोद कुमार वर्मा की मार्मिक कहानी "लंगड़ा कौन?"
    2026/07/05
    क्या वास्तविक विकलांगता शरीर की होती है, या संवेदनहीन मन और भ्रष्ट व्यवस्था की?"सुरता: साहित्य की धरोहर" के इस विशेष अंक में प्रस्तुत है छत्तीसगढ़ के सुप्रसिद्ध व्याकरणविद, कहानीकार एवं समीक्षक डॉ. विनोद कुमार वर्मा की अत्यंत मार्मिक और विचारोत्तेजक कहानी "लंगड़ा कौन?"रेलवे स्टेशन की एक साधारण-सी घटना से शुरू होने वाली यह कहानी धीरे-धीरे मानवीय संवेदना, नैतिकता, करुणा और सामाजिक व्यवस्था के गहरे प्रश्नों को सामने लाती है। एक शारीरिक रूप से दिव्यांग भिखारी अपनी मानवता से उस व्यक्ति की रक्षा करता है, जो स्वयं को सक्षम समझता है। अंत में कहानी एक ऐसा प्रश्न छोड़ जाती है जिसका उत्तर प्रत्येक श्रोता को स्वयं देना होगा—आख़िर लंगड़ा कौन है?इस कहानी को साहित्य जगत में व्यापक सराहना मिली है।डॉ. शंकर लाल शर्मा ने इसे आधुनिक समय में प्रेमचंद की परंपरा को आगे बढ़ाने वाली सशक्त लघुकथा बताया है।डॉ. रामगरीब पाण्डेय 'विकल' ने इसे एक साँस में पढ़ जाने वाली, वस्तु और शिल्प की दृष्टि से उत्कृष्ट रचना कहा है।पवन जैन, अनिता मिश्रा और गीता शुक्ला ने इसे भाषा की सीमाओं से ऊपर उठकर हृदय को स्पर्श करने वाली कहानी बताया।प्रख्यात साहित्यकार मणिशंकर दुबे 'रामरागी' ने अपनी समीक्षा में इसे मानवीय करुणा, परोपकार और सामाजिक संवेदनहीनता पर गहन प्रहार करने वाली रचना कहा है। वहीं लेखक डॉ. विनोद कुमार वर्मा ने अपनी प्रतिक्रिया में स्पष्ट किया है कि इस कहानी का वास्तविक नायक वही लंगड़ा भिखारी है, जिसने निःस्वार्थ भाव से मानवता का सर्वोच्च उदाहरण प्रस्तुत किया।इसके अतिरिक्त कमलेश प्रसाद शर्मा 'बाबू' ने अपनी सृजनात्मक प्रतिक्रिया के माध्यम से इस कहानी के भावलोक को एक नया आयाम प्रदान किया है।यदि आप ऐसी कहानियाँ सुनना चाहते हैं जो केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि आत्ममंथन भी कराएँ, तो यह प्रस्तुति अवश्य सुनें।🎙️ प्रस्तुति: सुरता: साहित्य की धरोहर✍️ लेखक: डॉ. विनोद कुमार वर्मा#लंगड़ा_कौन #डॉ_विनोद_कुमार_वर्मा #Surta #सुरता_साहित्य_की_धरोहर #HindiStory #ChhattisgarhiStory #StoryPodcast #कहानी_वाचन #साहित्य #हिंदी_कहानी #मानवीय_संवेदना #मणिशंकर_दुबे #रामरागी #डॉ_शंकर_लाल_शर्मा #डॉ_रामगरीब_पाण्डेय #पवन_जैन #अनिता_मिश्रा #गीता_शुक्ला #कमलेश_प्रसाद_शर्मा #BookPodcast #Literature #AudioStory #Humanity ...
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    13 分
  • एक राजर्षि की मूर्त कल्पना है शाहजहांपुर की पब्लिक लाइब्रेरी
    2026/05/20

    सुरता: साहित्य की धरोहर” के इस विशेष एपिसोड में प्रस्तुत है
    उत्तर प्रदेश के शाहजहाँपुर स्थित स्वामी विवेकानंद पब्लिक लाइब्रेरी पर आधारित एक प्रेरणादायी चर्चा।

    प्रोफेसर रवीन्द्र प्रताप सिंह द्वारा लिखित इस आलेख में
    इस अद्भुत पुस्तकालय को ज्ञान, संस्कृति और चिंतन के एक दिव्य केंद्र के रूप में प्रस्तुत किया गया है।
    यह केवल पुस्तकों का संग्रहालय नहीं,
    बल्कि अध्ययन, आत्मिक शांति और बौद्धिक जागरण का एक जीवंत स्थल है।

    इस चर्चा में जानिए —
    📚 कैसे इस लाइब्रेरी में वेद, उपनिषद, दर्शन, आधुनिक विज्ञान, विश्व साहित्य और विविध भाषाओं की दुर्लभ पुस्तकों का समृद्ध संग्रह मौजूद है।
    📖 कैसे यह संस्थान विद्यार्थियों, शोधकर्ताओं और साहित्यप्रेमियों के लिए प्रेरणा का केंद्र बना हुआ है।
    🕯️ और क्यों इसे शाहजहाँपुर की सांस्कृतिक धरोहर और ज्ञान के प्रकाश स्तंभ के रूप में देखा जाता है।

    यह एपिसोड उन सभी श्रोताओं के लिए विशेष है
    जो पुस्तकालयों, साहित्य, अध्ययन संस्कृति और भारतीय ज्ञान परंपरा से प्रेम करते हैं।

    🎙️ सुनिए —
    “सुरता: साहित्य की धरोहर”
    जहाँ शब्द केवल पढ़े नहीं जाते,
    बल्कि संवेदनाओं और विचारों में जीवित रहते हैं।

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    17 分
  • काव्य पाठ — “पुरु–उर्वशी संवाद : विरह में रचा जीवन”,
    2026/01/21

    इस साप्ताहिक अंक में सुरता साहित्य की धरोहर प्रस्तुत करता है एक विचारोत्तेजक और भावप्रवण काव्य पाठ
    “पुरु–उर्वशी संवाद : विरह में रचा जीवन”,
    रचनाकार आदर्श उज्जवल उपाध्याय (लखनऊ)

    यह कविता पौराणिक कथा के माध्यम से मानव जीवन के गहरे दर्शन को उद्घाटित करती है। पुरु और उर्वशी के संवाद के जरिए रचना देवत्व और मानवता, अमरता और नश्वरता, विलास और तपस्या जैसे द्वंद्वों को अत्यंत सरल और संवेदनशील भाषा में प्रस्तुत करती है। एक ओर पुरु पृथ्वी लोक के संघर्ष, पीड़ा और सीमित जीवन की यथार्थ तस्वीर रखते हैं, वहीं उर्वशी नारीत्व को सृजन, तप और प्रेम की सर्वोच्च अवस्था मानते हुए पृथ्वी पर जीवन को स्वीकार करती हैं।

    यह काव्य नारी बनने के गौरव, मानव प्रेम की तपस्या और जीवन की सार्थकता पर गहन विमर्श करता है। विरह, करुणा और आत्मबोध से भरी यह रचना श्रोताओं को सोचने पर विवश करती है कि वास्तविक सुख अमरत्व में नहीं, बल्कि संघर्षों से भरे मानवीय जीवन को पूरी चेतना से जीने में है।

    सुरता साहित्य की धरोहर का यह अंक कविता प्रेमियों और विचारशील श्रोताओं के लिए एक भावनात्मक और दार्शनिक अनुभव है।

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    7 分
  • चित्र और प्रेम की शाश्वत सार्थकता
    2026/01/14

    इस साप्ताहिक प्रस्तुति में सुरता साहित्य की धरोहर के अंतर्गत प्रस्तुत है लघु व्यंग्य आलेख “चित्र अथवा फोटो की सार्थकता” — लेखक डॉ. अर्जुन दुबे की एक विचारोत्तेजक रचना। यह आलेख मानवीय मनोविज्ञान और सौंदर्यबोध के उस पहलू को उजागर करता है, जहाँ व्यक्ति केवल एक चित्र, आकृति या फोटो को देखकर ही प्रेम, आकर्षण और कल्पना की दुनिया में प्रवेश कर जाता है।

    लेखक कालिदास की काव्य परंपरा और पौराणिक उदाहरणों के माध्यम से यह स्पष्ट करते हैं कि बाह्य सौंदर्य का प्रभाव युगों से मानव जीवन में बना हुआ है। प्राचीन चित्रकला से लेकर आधुनिक फोटोग्राफी तक, रूप और छवि आज भी सामाजिक संबंधों, विशेषकर वैवाहिक चयन और मानवीय आकर्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

    यह व्यंग्य रचना केवल रूप-सौंदर्य पर ही नहीं ठहरती, बल्कि यह भी संकेत देती है कि सच्चा सौंदर्य शरीर तक सीमित नहीं होता, बल्कि वह आत्मा को स्पर्श करने वाली गहन अनुभूति है। हास्य और चिंतन के संतुलन के साथ यह आलेख पाठकों और श्रोताओं को आत्ममंथन के लिए प्रेरित करता है।

    यह एपिशोड साहित्य और कला की उस अमर शक्ति को नमन करता है, जो किसी व्यक्ति, विचार या चरित्र को समय के पार स्थायी बना देती है।

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    14 分