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Surta: Sahitya Ki Dharohar

Surta: Sahitya Ki Dharohar

著者: रमेश चौहान
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"सुरता: साहित्य की धरोहर" – 2018 से निरंतर प्रकाशित साहित्यिक मंच, जहाँ हिन्दी और छत्तीसगढ़ी भाषा की कविताएँ, कहानियाँ, ग़ज़लें, व्यंग्य, और लोक रचनाएँ प्रस्तुत की जाती हैं। अब इन्हीं रचनाओं को आप सुन पाएँगे हमारी आवाज़ में — एक साहित्यिक यात्रा, शब्दों से स्वर तक। 🔹 हर सप्ताह नई रचनाएँ 🔹 गद्य और पद्य दोनों विधाओं की प्रस्तुतियाँ 🔹 विशेष श्रृंखलाएँ – कविता सप्ताह, लोककथा विशेष, संत साहित्य आदिरमेश चौहान アート エンターテインメント・舞台芸術
エピソード
  • 'मेडल' : ईमानदारी, कर्तव्य और सम्मान की प्रेरक कहानी
    2026/07/16

    क्या आज के समय में ईमानदारी का सम्मान होता है? क्या सत्य और कर्तव्यनिष्ठा अंततः अपना उचित स्थान प्राप्त करते हैं?

    'सुरता: साहित्य की धरोहर' के इस विशेष एपिशोड में प्रस्तुत है सुप्रसिद्ध व्याकरणविद्, कहानीकार एवं समीक्षक डॉ. विनोद कुमार वर्मा की प्रेरक हिन्दी कहानी "मेडल" का सस्वर वाचन।

    यह कहानी एक ऐसे युवा पुलिस अधिकारी हेमलाल मरकाम की है, जो बार-बार स्थानांतरण, राजनीतिक दबाव और कठिन परिस्थितियों के बावजूद अपने कर्तव्य से समझौता नहीं करता। मुख्यमंत्री की निजी गाड़ी का भी नियमों के अनुसार चालान करने वाला यह अधिकारी अंततः अपनी ईमानदारी, निष्पक्षता और कर्तव्यनिष्ठा के लिए भारतीय पुलिस पदक से सम्मानित होता है।

    एपिशोड में कहानी के साथ-साथ प्रतिष्ठित साहित्यकारों एवं समीक्षकों की समीक्षाएँ और प्रतिक्रियाएँ भी सम्मिलित हैं—

    • पद्मलोचन शर्मा — जिन्होंने कहानी को "सत्य परेशान हो सकता है, पराजित नहीं" के सिद्धांत का सशक्त उदाहरण बताया।
    • डॉ. भावना एन. सावलिया (गांधीनगर) — जिनके अनुसार यह कहानी युवा पीढ़ी में साहस, ईमानदारी और कर्तव्यबोध का संचार करती है।
    • मणिशंकर दुबे 'रामरागी' — जिन्होंने इसकी तुलना मुंशी प्रेमचंद की कालजयी कहानी "नमक का दरोगा" से करते हुए इसे सत्ता पर कर्तव्य की विजय की कथा कहा।
    • पवन जैन — जिन्होंने हिन्दी कथा में स्थानीय भाषा के प्रभावी प्रयोग की सराहना की।

    यदि आपको प्रेरक साहित्य, जीवन-मूल्यों पर आधारित कहानियाँ और साहित्यिक विमर्श पसंद हैं, तो यह एपिशोड अवश्य सुनें।

    सुरता: साहित्य की धरोहर — जहाँ शब्द केवल पढ़े नहीं जाते, बल्कि जीवन को दिशा भी देते हैं।

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    12 分
  • क्या सच्ची संपत्ति पैसा है या परिवार का प्रेम? | गुल्लक | कहानी वाचन एवं चर्चा
    2026/07/10

    सुरता : साहित्य की धरोहर के इस विशेष अंक में प्रस्तुत है व्याकरणविद्, कहानीकार एवं समीक्षक डॉ. विनोद कुमार वर्मा की अत्यंत संवेदनशील हिंदी लघुकथा "गुल्लक"

    यह कहानी एक साधारण निम्न-मध्यमवर्गीय परिवार की असाधारण संवेदनाओं की कथा है। महीने के अंतिम दिन आर्थिक अभाव से जूझते पिता और उनकी दस वर्षीय बेटी अंशु के बीच घटित एक छोटी-सी घटना प्रेम, त्याग, संस्कार और पारिवारिक आत्मीयता का ऐसा चित्र प्रस्तुत करती है, जो सीधे हृदय को स्पर्श करता है।

    इस एपिसोड में केवल कहानी का वाचन ही नहीं, बल्कि उस पर प्रतिष्ठित साहित्यकारों और समीक्षकों के विचार भी शामिल हैं।

    सुप्रसिद्ध कवयित्री वसन्ती वर्मा ने इस कहानी को भारतीय परिवारों के श्रेष्ठ संस्कारों का जीवंत चित्र बताया है।

    कवयित्री ज्योति गभेल ने कहा है कि जीवन में एक ऐसी गुल्लक अवश्य होनी चाहिए, जिसमें नेकी, रिश्ते और सच्चाई संचित हों।

    सुप्रसिद्ध समीक्षक मणिशंकर दुबे 'रामरागी' के अनुसार यह लघुकथा संग्रह नहीं, बल्कि अर्पण की संस्कृति का उत्सव है और यह संदेश देती है कि वास्तविक धन वही है जिसे प्रेमपूर्वक दूसरों के लिए समर्पित किया जाए।

    साथ ही सुभाष मित्तल, डोरेलाल कैवर्त तथा राम साशोनी की प्रतिक्रियाएँ भी इस रचना की संवेदनात्मक शक्ति और जीवन-मूल्यों को रेखांकित करती हैं।

    यदि आपको परिवार, रिश्तों, संवेदनाओं और मूल्यपरक साहित्य से प्रेम है, तो यह एपिसोड निश्चित रूप से आपके मन को स्पर्श करेगा।

    सुनिए, साझा कीजिए और साहित्य की इस संवेदनशील यात्रा का हिस्सा बनिए।

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    7 分
  • श्रद्धांजलि : पंडवानी की अमर स्वर-सम्राज्ञी डॉ. तीजन बाई
    2026/07/08

    पंडवानी की अमर स्वर-सम्राज्ञी, पद्म विभूषण से सम्मानित डॉ. तीजन बाई को "सुरता : साहित्य की धरोहर" की विनम्र श्रद्धांजलि।

    5 जुलाई को 70 वर्ष की आयु में उनके निधन के साथ भारतीय लोककला और छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक परंपरा ने अपनी एक अमूल्य धरोहर खो दी। इस विशेष श्रद्धांजलि एपिसोड में हम उनके संघर्षपूर्ण जीवन, अद्वितीय कला-साधना, पंडवानी को विश्व मंच तक पहुँचाने में उनके ऐतिहासिक योगदान तथा भारतीय लोकसंस्कृति में उनके अविस्मरणीय स्थान का स्मरण करते हैं।

    तीजन बाई ने अपनी ओजस्वी वाणी, सशक्त अभिनय और अनुपम कथावाचन शैली से महाभारत की कथाओं को जन-जन तक पहुँचाया। उन्होंने सिद्ध किया कि लोककला केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि हमारी सांस्कृतिक अस्मिता और जीवन-मूल्यों की जीवंत अभिव्यक्ति है।

    आइए, इस विशेष प्रस्तुति के माध्यम से उस महान लोक साधिका को श्रद्धा, कृतज्ञता और अश्रुपूरित नमन अर्पित करें, जिनकी स्वर-गाथा सदैव भारतीय संस्कृति के आकाश में गूँजती रहेगी।

    भावभीनी श्रद्धांजलि।

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    25 分
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