『विचारमंथन : Dr.King, Swami Satyapriya』のカバーアート

विचारमंथन : Dr.King, Swami Satyapriya

विचारमंथन : Dr.King, Swami Satyapriya

著者: Dr. King
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जीवन को गहराई से समझने के लिए विज्ञान, दर्शन और आध्यात्मिकता का संगम। बेहतर और उद्देश्यपूर्ण जीवन के लिए पाएं प्रेरक विचार और सकारात्मक सोच।(c) Dr. King スピリチュアリティ
エピソード
  • [Hindi] सुखों का आनंद लेने में कोई बुराई नहीं है। इसके लिए अपराधबोध मत पालिए।
    2026/08/08
    [Preview books] [Borrow books] [Pause] यह बात हममें से बहुत-से लोगों को मधुर संगीत जैसी लग सकती है। वास्तव में, बहुत-से लोग तो ऐसा अपराधबोध महसूस ही नहीं करते।फिर भी अधिकांश धर्म आत्मसंयम की शिक्षा देते हैं। बाइबल यही कहती है। क़ुरआन भी इसी पर ज़ोर देता है। अधिकांश भारतीय धर्म भी भोग में संयम रखने की सलाह देते हैं।तो क्या वे सभी धर्म, जो अत्यधिक भोग के विरुद्ध चेतावनी देते हैं, गलत हैं? यदि आप किसी भी धर्म को नहीं मानते, तब भी अत्यधिक भोग के प्रति सावधान रहने में कुछ सच्चाई है। इंद्रिय-सुखों में अत्यधिक डूब जाने के कुछ दुष्परिणाम होते हैं।• कोई भी सुख हमेशा नहीं रहता। आपका शरीर शीघ्र ही उस अवस्था तक पहुँच जाता है, जहाँ वह उससे अधिक आनंद नहीं ले सकता। यदि आप आवश्यकता से अधिक भोजन करते हैं, तो भोजन कितना भी स्वादिष्ट क्यों न हो, आपका शरीर एक सीमा के बाद उसका आनंद नहीं ले पाता।• कभी-कभी आनंद लेने की इच्छा बनी रहती है, लेकिन आनंद देनेवाली वस्तु ही समाप्त हो चुकी होती है। चूँकि कोई भी भौतिक वस्तु स्थायी नहीं होती, इसलिए ऐसा बार-बार होता है।• आप जितना अधिक सुख-भोग में लिप्त होते हैं, उतनी ही अधिक उनकी चाह बढ़ती जाती है। ऐसा तब भी हो सकता है, जब शरीर पूरी तरह तृप्त हो चुका हो। उस समय केवल मन ही और अधिक चाहता रहता है। "अब बहुत हुआ। मैं पूरी तरह संतुष्ट हूँ।" ऐसी अनुभूति शायद कभी नहीं आती। यही अंतहीन चाह आपको अशांत बनाती है। आप उस सुख का पीछा करते रहते हैं, लेकिन वह आपसे लगातार दूर होता जाता है।इसी संदर्भ में प्राचीन भारतीय ग्रंथ भगवद्गीता एक गहन चित्र प्रस्तुत करती है। वह कहती है:"जब कोई व्यक्ति निरंतर इंद्रिय-विषयों के बारे में सोचता रहता है, तो उनमें आसक्ति उत्पन्न होती है। आसक्ति से इच्छा जन्म लेती है। इच्छा पूरी न होने पर क्रोध उत्पन्न होता है। क्रोध से मोह पैदा होता है। मोह से भ्रम उत्पन्न होता है। भ्रम से विवेक नष्ट हो जाता है। और विवेक नष्ट होने पर मनुष्य पूरी तरह पतित हो जाता है।"ध्यायतो विषयान् पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते।सङ्गात् संजायते कामः कामात् क्रोधोऽभिजायते॥क्रोधाद्भवति सम्मोहः सम्मोहात्स्मृतिविभ्रमः।स्मृतिभ्रंशाद्बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति॥— भगवद्गीता 2.62–63.• सीमित संसाधनों वाली इस दुनिया में ...
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  • [Hindi] इस सुनहरे अवसर को हाथ से न जाने दें!
    2026/08/15
    [Preview books] [Borrow books] [Pause] पिछले अंक में हमने चर्चा की थी कि प्राचीन भारतीय सुखभोग के पूरी तरह विरोधी नहीं थे। उनका कहना केवल इतना था कि संयम के साथ सुख का आनंद लेना चाहिए। उन्होंने केवल उस स्वेच्छाचार पर रोक लगाई थी जो व्यक्ति को नुकसान पहुँचाने के साथ-साथ समाज के लिए भी परेशानी पैदा कर सकता है।तो क्या एक व्यक्ति एक के बाद एक जन्म लेता हुआ आगे नहीं बढ़ सकता? दुनिया का अनुभव करते हुए, और वह भी एक अच्छी, अनुशासित जीवन-पद्धति के साथ, जीवन जीता रह सकता है। फिर परम सत्य के साक्षात्कार और मुक्ति की चिंता क्यों करनी चाहिए?हाँ, कम से कम सिद्धांत के स्तर पर यह संभव है। लेकिन क्या वास्तव में सबकुछ इसी तरह होता है? पुनर्जन्म पूर्व की अधिकांश धर्म-परंपराओं में एक दृढ़ विश्वास है। आज दुनिया के प्रमुख धर्मों, ईसाई धर्म और इस्लाम, में पुनर्जन्म को स्वीकार नहीं किया जाता। लेकिन यह कहना शायद सही होगा कि प्राचीन संसार में लगभग सभी धर्म पुनर्जन्म को व्यापक रूप से स्वीकार करते थे।पुनर्जन्म के बारे में स्वयं मृत्यु के अधिपति से अधिक अधिकार के साथ और कौन बोल सकता है? एक प्राचीन भारतीय ग्रंथ, कठोपनिषद् में, स्वयं मृत्यु के अधिपति इस विषय पर विस्तार से बोलते हैं।आज का मेरा व्याख्यान इसी उपनिषद् पर आधारित है।उपनिषद् कहता है कि जब आप सुखभोग में पूरी तरह लीन हो जाते हैं, तब आपके किसी ऐसी जाल में फँस जाने की संभावना रहती है जिससे बचना आसान नहीं होता। हर समय अपनेआपको उससे बचा पाना संभव नहीं होता। आप अनियंत्रित सुखभोग के भँवर में फँसकर पूरी तरह अपना रास्ता भटक सकते हैं।अगर कोई रास्ता भटक भी गया तो क्या हुआ? अपनी गलतियों को सुधारने के लिए एक और जन्म तो मिलेगा ही!दुर्भाग्य से, बात इतनी सरल नहीं है।इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि आप फिर से मनुष्य के रूप में ही जन्म लेंगे। उदाहरण के लिए, अगर आपका पुनर्जन्म किसी पशु, कीड़े या पौधे के रूप में हुआ, तो उस जन्म में अपनी गलतियों को सुधारने के लिए आपके पास पर्याप्त बौद्धिक परिपक्वता शायद न हो। ऐसे रूपों में आपका जीवन केवल सहज प्रवृत्तियों से संचालित होता है। ये प्रवृत्तियाँ आपके जीवित रहने को तो सुनिश्चित करती हैं, लेकिन आपके आगे के विकास को नहीं।क्या कोई इससे भी उच्चतर जीव के रूप में ...
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  • [Hindi] तुरीय प्रज्ञा का वास्तविक चमत्कार
    2026/08/01
    [Preview books] [Borrow books] [Pause] पिछले कुछ एपिसोडों में हमने दर्शन की कुछ अत्यंत गहन अवधारणाओं की यात्रा की थी। हमने चर्चा की थी कि प्राचीन भारतीय ऋषि प्रज्ञा के बारे में क्या दृष्टिकोण रखते थे। उस चर्चा का सबसे महत्वपूर्ण भाग था प्रज्ञा की वह आश्चर्यजनक और मन को विस्मित कर देने वाली अवस्था, जिसे तुरीय कहा जाता है और जो अनुभव-आधारित समस्त तर्क से परे प्रतीत होती है।आधुनिक और तर्कप्रधान मन के लिए तुरीय की यह अवधारणा एक सुंदर कल्पना जैसी लग सकती है। यह एक काव्यमय, आदर्शवादी और अवास्तविक विचार भी प्रतीत हो सकती है। इसलिए कोई संशयवादी पूछ सकता है, "क्या वास्तवमें कोई इस अवस्था में जीया था? या यह केवल प्राचीन मनोविज्ञान की एक काल्पनिक कहानी है?"आज मैं आपके सामने यह तर्क रखना चाहता हूँ कि तुरीय की यह अवस्था केवल कल्पना नहीं है। संभव है कि हम इसे वैज्ञानिक रूपसे सिद्ध न करसकें। लेकिन हम उन लोगों के जीवन की प्रामाणिक घटनाओं का अध्ययन अवश्य करसकतेहैं, जिन्होंने इस अवस्था में जीवन बिताया। ऐसे लोग जो सदियों पहले नहीं, बल्कि कुछ ही दशक पहले हमारे बीच रहे। और जिनके जीवन की घटनाएँ बिना किसी अतिशयोक्ति या महिमामंडन के दर्ज की गई हैं। इसी उद्देश्य से मैं दक्षिण भारत के एक प्रसिद्ध संत के जीवन का उदाहरण लेना चाहता हूँ। मैं यहाँ किसी पुस्तक या स्तुतिगान का सहारा नहीं ले रहा हूँ। मेरा आधार केवल उन साधारण लोगों के अनुभव हैं, जिन्होंने उनके साथ जीवन बिताया और उन्हें अपनी आँखों से देखा। उन लोगों का कोई स्वार्थ नहीं था और न ही झूठ बोलने का कोई कारण।सबसे पहले यह जानकारी मुझे कुछ वृद्ध महिलाओं से मिली, जो उस संत के जीवनकाल में जीवित थीं। वे नहीं जानती थीं कि वे कौन थे। उन्हें यह भी पता नहीं था कि वे कहाँ से आए थे। वह संत दक्षिण भारत के तटीय गाँवों में पूर्णतः दिगम्बर होकर विचरण करते थे।वे लगभग किसी से बात नहीं करते थे, इसलिए उपदेश देने का तो प्रश्न ही नहीं उठता था। उन्होंने कभी किसी से भोजन भी नहीं माँगा। कभी-कभी लोग उन्हें कूड़ेदान में फेंका हुआ भोजन खाते हुए देखते थे। इसलिए लगभग सभी लोग उन्हें पागल समझते थे।गली के बच्चे उनका मज़ाक उड़ाते थे। यहाँ तक कि उन पर पत्थर भी फेंकते थे। लेकिन वे कभी प्रतिक्रिया नहीं देते थे। कभी-कभी उन ...
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