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[Hindi] सुखों का आनंद लेने में कोई बुराई नहीं है। इसके लिए अपराधबोध मत पालिए।

[Hindi] सुखों का आनंद लेने में कोई बुराई नहीं है। इसके लिए अपराधबोध मत पालिए।

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[Preview books] [Borrow books] [Pause] यह बात हममें से बहुत-से लोगों को मधुर संगीत जैसी लग सकती है। वास्तव में, बहुत-से लोग तो ऐसा अपराधबोध महसूस ही नहीं करते।फिर भी अधिकांश धर्म आत्मसंयम की शिक्षा देते हैं। बाइबल यही कहती है। क़ुरआन भी इसी पर ज़ोर देता है। अधिकांश भारतीय धर्म भी भोग में संयम रखने की सलाह देते हैं।तो क्या वे सभी धर्म, जो अत्यधिक भोग के विरुद्ध चेतावनी देते हैं, गलत हैं? यदि आप किसी भी धर्म को नहीं मानते, तब भी अत्यधिक भोग के प्रति सावधान रहने में कुछ सच्चाई है। इंद्रिय-सुखों में अत्यधिक डूब जाने के कुछ दुष्परिणाम होते हैं।• कोई भी सुख हमेशा नहीं रहता। आपका शरीर शीघ्र ही उस अवस्था तक पहुँच जाता है, जहाँ वह उससे अधिक आनंद नहीं ले सकता। यदि आप आवश्यकता से अधिक भोजन करते हैं, तो भोजन कितना भी स्वादिष्ट क्यों न हो, आपका शरीर एक सीमा के बाद उसका आनंद नहीं ले पाता।• कभी-कभी आनंद लेने की इच्छा बनी रहती है, लेकिन आनंद देनेवाली वस्तु ही समाप्त हो चुकी होती है। चूँकि कोई भी भौतिक वस्तु स्थायी नहीं होती, इसलिए ऐसा बार-बार होता है।• आप जितना अधिक सुख-भोग में लिप्त होते हैं, उतनी ही अधिक उनकी चाह बढ़ती जाती है। ऐसा तब भी हो सकता है, जब शरीर पूरी तरह तृप्त हो चुका हो। उस समय केवल मन ही और अधिक चाहता रहता है। "अब बहुत हुआ। मैं पूरी तरह संतुष्ट हूँ।" ऐसी अनुभूति शायद कभी नहीं आती। यही अंतहीन चाह आपको अशांत बनाती है। आप उस सुख का पीछा करते रहते हैं, लेकिन वह आपसे लगातार दूर होता जाता है।इसी संदर्भ में प्राचीन भारतीय ग्रंथ भगवद्गीता एक गहन चित्र प्रस्तुत करती है। वह कहती है:"जब कोई व्यक्ति निरंतर इंद्रिय-विषयों के बारे में सोचता रहता है, तो उनमें आसक्ति उत्पन्न होती है। आसक्ति से इच्छा जन्म लेती है। इच्छा पूरी न होने पर क्रोध उत्पन्न होता है। क्रोध से मोह पैदा होता है। मोह से भ्रम उत्पन्न होता है। भ्रम से विवेक नष्ट हो जाता है। और विवेक नष्ट होने पर मनुष्य पूरी तरह पतित हो जाता है।"ध्यायतो विषयान् पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते।सङ्गात् संजायते कामः कामात् क्रोधोऽभिजायते॥क्रोधाद्भवति सम्मोहः सम्मोहात्स्मृतिविभ्रमः।स्मृतिभ्रंशाद्बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति॥— भगवद्गीता 2.62–63.• सीमित संसाधनों वाली इस दुनिया में ...
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