『Hindu Reeti Riwaaz हिन्दू रीति रिवाज』のカバーアート

Hindu Reeti Riwaaz हिन्दू रीति रिवाज

Hindu Reeti Riwaaz हिन्दू रीति रिवाज

著者: Nilesh Kumar Agarwal
無料で聴く

【Amazonプライム会員限定】今ならプレミアムプランが4か月 月額99円。

10月19日まで。※適用条件あり
यूं तो हिन्दू धर्म वैज्ञानिक धर्म है। श्रेष्ठ संस्कारवान मानव का निर्माण करना भारतीय संस्कृति का मूलभूत उद्देश्य है। प्राचीन ऋषि-मुनियों ने मानव सभ्यता को सुसंस्कृत करने के लिए धर्म की पृष्ठभूमि पर कुछ नियम- सिद्धांत बनाए, जिनमें शिशु के गर्भ में आते ही आत्मा पर छाई मलिनता को हटा कर उस पर नए संस्कारों को आरोपित करने की व्यवस्था बनाई। इसका उद्देश्य मनुष्य के आध्यात्मिक जीवन को साकार करना और धार्मिकता के भावों की वृद्धि करना है। संस्कारों का प्रयोग ठीक उसी प्रकार किया जाता है, जैसे किसी औषधि को अनCopyright 2023 Nilesh Kumar Agarwal 教育
エピソード
  • सीमंतोन्नयन संस्कार
    2023/06/13
    सीमंतोन्नयन संस्कार को छठे से आठवें माह के बीच किया जाता है। प्रचलित मान्यता के अनुसार इसे गर्भावस्था के आठवें माह में करना शुभ माना गया हैं। दरअसल इसे करने का शुभ समय तब होता हैं जब शिशु का ज्यादातर विकास हो चुका होता हैं तथा उसमे सोचने व समझने की क्षमता विकसित हो जाती है।

    ऐसे समय में वह शिशु गर्भ में अपनी माँ के भावों, उसकी क्रियाओं, बातों इत्यादि को सुन सकता है तथा उन पर अपने भाव भी प्रकट कर सकता है। आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि इस समय यदि आपका मन प्रसन्न है तो आपका शिशु भी प्रसन्
    続きを読む 一部表示
    2 分
  • पुंसवन संस्कार
    2023/06/12
    पुंसवन संस्कार की विधि ओषधि अवघ्राणपुंसवन संस्कार के दौरान सबसे पहले एक विशेष प्रकार की औषधि गर्भवती महिला के नासिका छिद्र से उसके अंदर पहुँचाई जाती हैं। इस प्रक्रिया के दौरान गिलोय वृक्ष के तने से कुछ बूँदे निकालकर मंत्रोउच्चारण के साथ गर्भवती महिला की नासिका छिद्र पर लगाया जाता है। गिलोय के रस को खासतौर से कीटाणुरहित और रोगनाशक माना जाता है। इस संस्कार को करते समय विशेष रूप से गिलोय के रस को औषधि के रूप में किसी कटोरे में लेकर गर्भवती स्त्री को दिया जाता है। इस दौरान संस्कार में उपस्थित लोग विशेष रूप से “ॐ अदभ्यः सम्भृतः पृथिव्यै रसाच्च, विश्वकर्मणः संवर्त्तताग्रे। तस्य त्वष्टा विदधद्रूपमेति, तन्मर्त्यस्य देवत्वमाजानमग्रे। “…(-31.17) मंत्र का उच्चारण करते हैं। मान्यता है कि मंत्रोउच्चारण के बीच गर्भवती स्त्री अपने दाहिने हाथ से औषधि को अपनी नासिका के ऊपर लगाकर श्वास को अंदर खींचें। जिस दौरान, होने वाले शिशु के पिता सहित परिवार के अन्य सभी सदस्य भी अपना दाहिना हाथ गर्भवती स्त्री के पेट पर रखें और उपरोक्त मन्त्र का जाप करते हुए ओषधि अवघ्राण की क्रिया को संपन्न करें तो इससे शिशु को भगवान अच्छा स्वास्थ्य प्रदान करते हैं।गर्भ पूजनशास्त्रों में गर्भ को पूज्य माना गया है, क्योंकि माता के गर्भ के माध्यम से जो जीव मनुष्य रूपी संसार का हिस्सा बनना चाहता है उसे खासतौर पर ईश्वर का प्रतिनिधि माना जाता है।गर्भ में मौजूद शिशु को संस्कारित करने के लिए माता सहित परिवार के अन्य सदस्यों विशेष उपासना करें।गर्भवती स्त्री खासतौर से इस दौरान आराम और सेहतमंद भोजन ग्रहण करें और साथ ही शिशु के सर्वांगीण विकास की कामना भी करें।माना जाता है कि अगर गर्भवती स्त्री गायत्री मंत्र का जाप रोज करें तो भगवान उसकी संतान पर कृपा बरसाते हैं।इसी बात को ध्यान में रखते हुए और पुंसवन संस्कार में गर्भ पूजन की प्रक्रिया के समय गर्भवती स्त्री के परिवार के सभी सदस्य और परिजन हाथ में फूल और अक्षत लेकर मंत्रोउच्चारण के साथ गर्भ में मौजूद शिशु के अच्छे स्वास्थ्य और सद्भाव की कामना करें।“ॐ सुपर्णोसि गुरुत्माँस्त्रिवृते शिरो, गायत्रं चक्षुबृहद्रथन्तरे पक्षौ। स्तोम आत्मा छंदा स्यढाणि यजु षि नाम। साम ते ...
    続きを読む 一部表示
    4 分
  • गर्भाधान संस्कार क्यों?
    2023/06/10

    दांपत्य जीवन का सर्वोच्च उद्देश्य है-श्रेष्ठ गुणों वाली, स्वस्थ, ओजस्वी, चरित्रवान और यशस्वी संतान प्राप्त करना । स्त्री-पुरुष की प्राकृतिक संरचना ही ऐसी है कि यदि उचित समय पर संभोग किया जाए, तो संतान होना स्वाभाविक ही है, किंतु गुणवान संतान प्राप्त करने के लिए माता-पिता को विचार पूर्वक इस कर्म में प्रवृत्त होना पड़ता है। श्रेष्ठ संतान की प्राप्ति के लिए विधि-विधान से किया गया संभोग ही गर्भाधान संस्कार कहा जाता है। इसके लिए माता-पिता को शारीरिक और मानसिक रूप से अपने आपको तैयार करना होता है, क्योंकि आने वाली संतान उनके ही आत्म का प्रतिरूप है। इसीलिए तो पुत्र को आत्मज और पुत्री को आत्मजा कहा जाता है।

    गर्भाधान के संबंध में स्मृति संग्रह में लिखा है-

    निषेकाद् बैजिकं चैनो गार्भिकं चापमृज्यते ।

    क्षेत्र संस्कारसिद्धिश्च गर्भाधानफलं स्मृतम् ॥

    अर्थात् विधि पूर्वक संस्कार से युक्त गर्भाधान से अच्छी और सुयोग्य संतान उत्पन्न होती है। इस संस्कार से वीर्य संबंधी तथा गर्भ संबंधी पाप का नाश होता है, दोष का मार्जन तथा क्षेत्र का संस्कार होता है। यही गर्भाधान संस्कार का फल है।

    पर्याप्त खोजों के बाद चिकित्सा शास्त्र भी इस निष्कर्ष पर पहुंचा है कि गर्भाधान के समय स्त्री-पुरुष जिस भाव से भावित होते हैं, उसका प्रभाव उनके रज-वीर्य में भी पड़ता है। अतः उस रज- वीर्यजन्य संतान में माता-पिता के वे भाव स्वतः ही प्रकट हो जाते हैं-

    आहाराचारचेष्टाभिर्यादृशोभिः समन्वितौ ।

    स्त्रीपुंसौ समुपेयातां तयोः पुत्रोऽपि तादृशः ॥ सुश्रुत संहिता / शारीर / 2/46/50

    続きを読む 一部表示
    4 分
adbl_web_anon_alc_button_suppression_t1
まだレビューはありません