Gandhi का अंतिम साल: बेटे का धोखा, ब्रह्मचर्य की सनक और Patel से नाराज़गी! : Padhaku Nitin Podcast
カートのアイテムが多すぎます
ご購入は五十タイトルがカートに入っている場合のみです。
カートに追加できませんでした。
しばらく経ってから再度お試しください。
ウィッシュリストに追加できませんでした。
しばらく経ってから再度お試しください。
ほしい物リストの削除に失敗しました。
しばらく経ってから再度お試しください。
ポッドキャストのフォローに失敗しました
ポッドキャストのフォロー解除に失敗しました
-
ナレーター:
-
著者:
अगर कोई विचार समय बीतने के साथ और ज़्यादा relevant होता जाए, और ज़्यादा लोग उससे connect करने लगें—तो क्या इसका मतलब है कि वो विचार महान भी है और ज़रूरी भी?
हम गांधी के देश में रहते हैं। जब भी कोई आंदोलन होता है, जब भी अहिंसा, सत्याग्रह या नागरिक प्रतिरोध की बात होती है, गांधी का नाम सामने आता है। लेकिन इसके साथ एक सवाल भी उठता है—**आज के समय में गांधी का तरीका कितना relevant है?**
2 अक्टूबर, गांधी जयंती के आसपास रिकॉर्ड किए गए इस खास एपिसोड में हम इसी सवाल को तलाशने की कोशिश कर रहे हैं।
इस बातचीत की शुरुआत हुई एक किताब से—**‘गांधी का सैंतालीस’**, जिसे लिखा है वरिष्ठ पत्रकार **पुष्यमित्र** ने।
लेकिन सवाल ये है कि **2026 में 1947 के गांधी की बात करना क्यों ज़रूरी लगा?**
1947 में देश आज़ाद हुआ, लेकिन उसी साल भारत ने विभाजन, सांप्रदायिक हिंसा और विस्थापन की भयानक त्रासदी भी देखी। उस दौर में गांधी सत्ता के केंद्र में नहीं, बल्कि उन जगहों पर मौजूद थे जहाँ समाज सबसे ज्यादा टूट रहा था—नोआखाली से लेकर दिल्ली तक।
पुष्यमित्र ने 1947 के गांधी को फिर से पढ़ने की जरूरत क्यों महसूस की? उस गांधी से आज हम क्या सीख सकते हैं? क्या गांधी का सत्य, अहिंसा और सामाजिक सद्भाव का विचार आज भी उतना ही relevant है? और क्या गांधी को समझने के लिए उनके समर्थकों से ज्यादा उनके आलोचकों को सुनना जरूरी है?
किताब पढ़ते हुए मेरे मन में एक एहसास आया—**शायद गांधी सिर्फ अपने समर्थकों के नहीं थे। शायद वो अपने आलोचकों के और भी करीब रहना चाहते थे।**
इन्हीं सवालों और क़िस्सों के साथ यह बातचीत।
गांधी में जिज्ञासा रखते हैं, तो ये पॉडकास्ट सुनिए।
गांधी से असहमति रखते हैं, तो ये पॉडकास्ट और भी ज़रूर सुनिए।
क्योंकि किसी विचार को समझने का सबसे अच्छा तरीका शायद उसे मान लेना नहीं, बल्कि उससे सवाल करना है।
adbl_web_anon_alc_button_suppression_t1
まだレビューはありません