।। भगवान तो प्राप्त ही है ।।
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* चित्त भोगासक्ति में लगा है, इस लिए अनुभव नहीं हो रहा
* मन अपने को ठग रहा है
* आप लोगों को सुनने का व्यसन पड़ गया है, करते धरते कुछ नहीं
* सीखने और जानने में अंतर होता है
* कितने लोगों में यह भावना है, शरीर जाता हो तो चला जय ? आसक्तियां भरी पड़ी हैं
* जितनी लगन से डिग्रियां प्राप्त करी हैं, वह इस बात के लिए नहीं है
* सभी को भगवान का अंश मानकर उनकी सेवा में रस लो, इस जगत की सेवा में अपने को राख बनाना पड़ता है
* भाव तो रखना है शुद्ध, व्यवहार वो जो जरूरत है
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