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सफ़र (हद-अनहद)

सफ़र (हद-अनहद)

著者: Anand
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概要
ये सफऱ है,खुद तक जाने का शब्दों के सहारे...!!Anand 社会科学
エピソード
  • तुम अंत में आना
    2026/09/27


    जिस तरह मैं तुम्हें ढूँढ़ा करता हूँ,

    तुम्हें भी तलाश होगी किसी और की।

    काश, हम कभी न मिलें,

    काश, मैं हमेशा तुम्हारी तलाश में रहूँ।


    मैं सबसे पहले तो नहीं मिला तुम्हें,

    पर हो सके तो तुम सबसे आख़िर में आना।


    और मैं ‘नेति-नेति’ के सिद्धांतों को ताक पर रखकर

    तुम्हारी ओर लौटूँ।

    तुम्हारे आने से पहले सब बीत चुका हो मेरे भीतर से

    कि तुम जब गुज़रो तो और कुछ न गुज़रे।

    तुम जब बसो, तो बस तुम्हारी महक से लबरेज़ हो उठूँ मैं।

    तुम्हारे आने के बाद किसी और आहट की तमन्ना न रहे।

    हो सके तो सबसे आख़िर में आना,

    और अंत तक ठहरना।


    बंजर ज़मीन पर एक फूल को सहेजने की ख्वाहिश लिए,

    मैं तुम्हें अंत में बुला रहा हूँ,

    ताकि इतनी खाद इकट्ठी कर सकूँ कि सँभाल सकूँ तुम्हें,

    और सँभाल सकूँ अपने ही अस्तित्व को


    Not today,

    But someday this poetry will make sense

    - आनंद




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