• दिन 31: यीशु की तरह नेतृत्व कैसे करें
    2025/01/31
    मत्ती 21:1-17, अय्यूब 19:1-21:34, भजन संहिता 18:1-6, कुछ ही लोगों ने कॅन ब्लॅनचॉर्ड से बढ़कर लोगों और कंपनियों के दैनिक प्रबंध पर प्रभाव डाला है। वर्ष 1982 में, उन्होंने लिखा ‘द वन मिनट मैनेजर’ जिसकी कॉपी की बिक्री 130 लाख से भी ज़्यादा हो गई थी। यह पुस्तक बहुत ही कम समय में सफल हुई, यहाँ तक कि उन्हें इसकी सफलता का श्रेय लेने में कठिनाइयाँ होने लगीं। उन्होंने परमेश्वर के बारे में सोचना आरंभ किया। उन्होंने बाइबल पढ़ना आरंभ किया। वे सीधे सुसमाचार की ओर गए। वे जानना चाहते थे कि यीशु ने क्या किया था। वे बहुत प्रभावित हुए कि यीशु ने कैसे बारह साधारण और अविश्वसनीय लोगों को बदलकर, प्रथम पीढ़ी के गतिविधियों का अगुआ बना दिया था, जो 2,000 साल बाद भी संसार के इतिहास को प्रभावित कर रहे हैं। वे इस बात को जान गए थे कि उन्होंने प्रभावी अगुआई के बारे में जो कुछ कहा था, उसे यीशु ने सम्पूर्ण सिद्धता से इस प्रकार कर दिखाया है, जो केन के बयान या वर्णन करने की क्षमता से कहीं ज़्यादा है। यीशु आत्मिक अगुए से बढ़कर हैं। वह व्यवहारिक और प्रभावशाली नेतृत्व का आदर्श सभी संस्था, सभी लोगों, सभी परिस्थितियों के लिए बताते हैं। परिणाम स्वरूप, कॅन ब्लॅनचॉर्ड ने ‘लीड लाइक जीसस’ (‘यीशु की तरह नेतृत्व करें’) सेवकाई की स्थापना की, जिससे लोगों को प्रेरित और सक्षम बनाया जाए — बिल्कुल वैसा ही करने के लिए — जैसा यीशु ने नेतृत्व किया था। यीशु अब तक के सबसे महान अगुए रहे हैं। इस पद्यांश में हम दाऊद और अय्यूब जैसे दो महान लोगों के साथ यीशु के नेतृत्व के गुणों को देखेंगे बाइबल के ।
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  • दिन 30: क्या परमेश्वर हमारी सभी प्रार्थनाओं का उत्तर देते हैं?
    2025/01/30
    मत्ती 20:20-34, अय्यूब 15:1-18:21, भजन संहिता 17:13-15, मुझे क्रिकेट पसंद है। कम से कम मैं उसे देखना पसंद करता हूँ: मैं इसे खेलने में बिल्कुल अच्छा नहीं था। लेकिन मैं जानता हूँ कि बहुत से लोगों को क्रिकेट पसंद नहीं है और यहाँ तक कि वे उनके नियमों को भी नहीं समझते (विशेष रुप से , यदि वे ऐसे देश में आए हों जहाँ क्रिकेट लोकप्रिय खेल ना हो)। उम्मीद है कि आप मुझे क्रिकेट की उपमा देने के लिए क्षमा करेंगे। जब दो बल्लेबाज़ क्रिकेट पिच पर विकेटो के बीच दौड़ते हैं, तो उन्हे एक दूसरे के साथ संयोजन करके निर्णय लेना होता है कि वे दौड़ें या नहीं। एक चिल्लाते हुए दूसरे से कहता है ‘हाँ’ (इसका मतलब, ‘दौड़ो’) या ‘नहीं’ (इसका मतलब, ‘जहाँ हैं वहीं रुकें’), या ‘इंतज़ार करें’ (इसका मतलब है, ‘हम देखते हैं कि दौड़ने का निर्णय लेने से पहले क्या होता है’)। एक तरह से परमेश्वर हमारी सभी प्रार्थनाओं को सुनते हैं, वे हमारी सभी प्रार्थनाओं का उत्तर भी देते हैं। लेकिन हम हमेशा वो नहीं प्राप्त करते हैं जो हम माँगते हैं। जब हम परमेश्वर से कुछ माँगते हैं, तो उनका उत्तर ‘हाँ’ या ‘नहीं’ या ‘इंतज़ार करें’ के रूप में होता है। जॉन स्टॉट लिखते हैं कि यदि हमने उनसे कुछ ऐसा माँगा है जो ‘अपने आप में अच्छा नहीं है, या हमारे लिए या दूसरों के लिए अच्छा नहीं है, तो परमेश्वर ‘नहीं’ के रूप में उत्तर देंगे, स्पष्ट रूप से या अप्रत्यक्ष रूप से; तुरंत या अंत में। हमें हमेशा ‘नहीं’ उत्तर का कारण पता नहीं चलता। हमें यह याद रखना चाहिये कि परमेश्वर चीज़ों को अनंत के दृष्टिकोण से देखते हैं और कुछ चीज़ें ऐसी हैं, जिन्हें हम अपने इस जीवन में कभी समझ नहीं पाएंगे। इस पद में हम आज परमेश्वर के तीनों प्रकार के उत्तरों का उदाहरण देखेंगे।
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  • दिन 29: आपसे प्रेम किया गया है
    12 分
  • दिन 28: परमेश्वर के साथ सब कुछ सम्भव है।
    2025/01/28
    नीतिवचन 3:11–20, मत्ती 19:16–30, अय्यूब 8:1–10:22 परमेश्वर के लिए कुछ भी असम्भव नहीं है।
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  • दिन 27: कैसे सही रास्ते पर बने रहें
    2025/01/27
    भजन 17:1–5, मत्ती 19:1–15, अय्यूब 4:1–7:21 बाइबल में अक्सर परमेश्वर के मार्गों की तस्वीर दी जाती है—ऐसे मार्ग जो जीवन की ओर ले जाते हैं।
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  • दिन 26: परमेश्वर तकलीफें क्यों आने देते हैं?
    2025/01/26
    भजन संहिता 16:1–11, मत्ती 18:10–35, अय्यूब 1:1–3:26 दुख और पीड़ा परमेश्वर की मूल रचना का हिस्सा नहीं हैं (देखें उत्पत्ति 1–2)। दुनिया में कोई दुख नहीं था जब तक मनुष्यों ने परमेश्वर के खिलाफ विद्रोह नहीं किया। जब परमेश्वर नया आकाश और नई पृथ्वी बनाएंगे (प्रकाशितवाक्य 21:3–4), तब भी दुख नहीं होगा। इसलिए दुख परमेश्वर की दुनिया में एक बाहरी घुसपैठ है।
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  • दिन 25: परमेश्वर का इरादा भलाई करना था
    2025/01/25
    भजन संहिता 15:1–5, मत्ती 17:14–18:9, उत्पत्ति 49:1–50:26 परमेश्वर आपसे प्रेम करता है। आपका दुख भी उसका दुख है। वह आपके साथ-साथ दुख उठाता है। फिर भी वह हमेशा आपके जीवन से दुखों को हटा ही दे, ऐसा नहीं है; कभी-कभी वह बुरी घटनाओं का उपयोग अपने भले उद्देश्यों को पूरा करने के लिए करता है।
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  • दिन 24: परमेश्वर की आवाज़ कैसे सुनें
    2026/01/24
    नीतिवचन 3:1–10, मत्ती 16:21–17:13, उत्पत्ति 47:13–48:22 ज़िंदगी के शोर और ध्यान भटकाने वाली चीज़ों के बीच, आप परमेश्वर की आवाज़ कैसे सुनते हैं?
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