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दिन 30: क्या परमेश्वर हमारी सभी प्रार्थनाओं का उत्तर देते हैं?

दिन 30: क्या परमेश्वर हमारी सभी प्रार्थनाओं का उत्तर देते हैं?

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概要

मत्ती 20:20-34, अय्यूब 15:1-18:21, भजन संहिता 17:13-15, मुझे क्रिकेट पसंद है। कम से कम मैं उसे देखना पसंद करता हूँ: मैं इसे खेलने में बिल्कुल अच्छा नहीं था। लेकिन मैं जानता हूँ कि बहुत से लोगों को क्रिकेट पसंद नहीं है और यहाँ तक कि वे उनके नियमों को भी नहीं समझते (विशेष रुप से , यदि वे ऐसे देश में आए हों जहाँ क्रिकेट लोकप्रिय खेल ना हो)। उम्मीद है कि आप मुझे क्रिकेट की उपमा देने के लिए क्षमा करेंगे। जब दो बल्लेबाज़ क्रिकेट पिच पर विकेटो के बीच दौड़ते हैं, तो उन्हे एक दूसरे के साथ संयोजन करके निर्णय लेना होता है कि वे दौड़ें या नहीं। एक चिल्लाते हुए दूसरे से कहता है ‘हाँ’ (इसका मतलब, ‘दौड़ो’) या ‘नहीं’ (इसका मतलब, ‘जहाँ हैं वहीं रुकें’), या ‘इंतज़ार करें’ (इसका मतलब है, ‘हम देखते हैं कि दौड़ने का निर्णय लेने से पहले क्या होता है’)। एक तरह से परमेश्वर हमारी सभी प्रार्थनाओं को सुनते हैं, वे हमारी सभी प्रार्थनाओं का उत्तर भी देते हैं। लेकिन हम हमेशा वो नहीं प्राप्त करते हैं जो हम माँगते हैं। जब हम परमेश्वर से कुछ माँगते हैं, तो उनका उत्तर ‘हाँ’ या ‘नहीं’ या ‘इंतज़ार करें’ के रूप में होता है। जॉन स्टॉट लिखते हैं कि यदि हमने उनसे कुछ ऐसा माँगा है जो ‘अपने आप में अच्छा नहीं है, या हमारे लिए या दूसरों के लिए अच्छा नहीं है, तो परमेश्वर ‘नहीं’ के रूप में उत्तर देंगे, स्पष्ट रूप से या अप्रत्यक्ष रूप से; तुरंत या अंत में। हमें हमेशा ‘नहीं’ उत्तर का कारण पता नहीं चलता। हमें यह याद रखना चाहिये कि परमेश्वर चीज़ों को अनंत के दृष्टिकोण से देखते हैं और कुछ चीज़ें ऐसी हैं, जिन्हें हम अपने इस जीवन में कभी समझ नहीं पाएंगे। इस पद में हम आज परमेश्वर के तीनों प्रकार के उत्तरों का उदाहरण देखेंगे।
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