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गीता-योग: अध्यात्मिक प्रबोधन की श्रवण यात्रा

गीता-योग: अध्यात्मिक प्रबोधन की श्रवण यात्रा

著者: रमेश चौहान
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"गीता-योग: अध्यात्मिक प्रबोधन की श्रवण यात्रा" एक आध्यात्मिक और चिंतनशील पॉडकास्ट श्रृंखला है, जो भगवद्गीता के 18 अध्यायों की गहन व्याख्या पर आधारित है। इस चर्चा का आधार ''अध्यात्मिक प्रबोधन: गीता के 18 योग" श्रृंखला पुस्तक है । यह श्रृंखला उन श्रोताओं के लिए समर्पित है जो जीवन के गूढ़ प्रश्नों — धर्म, कर्म, आत्मा, मोह, और आत्मबोध — के उत्तर खोज रहे हैं। हर एपिसोड आपको एक नए योग अध्याय की ओर ले जाता है, जिसमें गीता के श्लोकों का स्पष्ट, भावनात्मक और शास्त्रीय वाचन किया गया है, साथ ही उनके अर्थ को आज के परिप्रेक्ष्य में सरल भाषा में समझाया गया है । "शब्द नहीं, आत्मा बोलेगी — गीता के योगों से!"रमेश चौहान スピリチュアリティ ヒンズー教
エピソード
  • विश्वरूपदर्शनयोग (श्लोक 26–34): महाकाल का उद्घोष और अर्जुन का कर्तव्य
    2026/07/14

    गीता-योग: अध्यात्मिक प्रबोधन की श्रवण यात्रा” के इस विशेष एपिशोड में हम अध्यात्मिक प्रबोधन: गीता के 18 योग के खंड 12 — विश्वरूपदर्शनयोग के अंतर्गत श्लोक 26 से 34 के मूल पाठ, अर्थ और आध्यात्मिक व्याख्या पर विचार करेंगे।

    इन श्लोकों में अर्जुन भगवान श्रीकृष्ण के विश्वरूप का वह पक्ष देखते हैं जहाँ समस्त योद्धा काल के प्रवाह में भगवान के विकराल मुख में प्रवेश करते दिखाई देते हैं। भगवान स्वयं को महाकाल के रूप में प्रकट करते हुए बताते हैं कि सृष्टि का संहार भी उसी दिव्य व्यवस्था का एक अनिवार्य अंग है, और धर्म की स्थापना के लिए अधर्म का अंत निश्चित है।

    श्रीकृष्ण अर्जुन को यह बोध कराते हैं कि युद्ध का परिणाम पहले ही ईश्वरीय योजना में निर्धारित है। अर्जुन केवल निमित्त मात्र हैं। उनका धर्म है कि वे मोह, भय और परिणाम की चिंता छोड़कर अपने कर्तव्य का पालन करें। यही गीता का निष्काम कर्म और धर्मपालन का शाश्वत संदेश है।

    यह एपिशोड हमें सिखाता है कि जीवन में अनेक घटनाएँ हमारे नियंत्रण से बाहर होती हैं, परंतु हमारा अधिकार केवल अपने कर्म, अपने निर्णय और अपने धर्म पर है। जब हम स्वयं को ईश्वर की योजना का माध्यम मानकर कार्य करते हैं, तभी भय समाप्त होता है और आत्मविश्वास जन्म लेता है।

    यदि आप गीता के इस गहन दार्शनिक प्रसंग—महाकाल, नियति और निष्काम कर्म—को समझना चाहते हैं, तो यह एपिशोड आपके लिए अत्यंत प्रेरणादायक और चिंतनशील सिद्ध होगा।

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    25 分
  • विश्वरूपदर्शनयोग (श्लोक 13–25): विराट विश्वरूप का विस्मयकारी दर्शन
    2026/06/16

    गीता-योग: अध्यात्मिक प्रबोधन की श्रवण यात्रा” के इस विशेष एपिशोड में हम अध्यात्मिक प्रबोधन: गीता के 18 योग के खंड 12 — विश्वरूपदर्शनयोग के अंतर्गत श्लोक 13 से 25 के मूल पाठ, अर्थ और आध्यात्मिक व्याख्या पर चर्चा करेंगे।

    इन श्लोकों में अर्जुन भगवान श्रीकृष्ण के उस विराट और दिव्य स्वरूप का दर्शन करते हैं, जिसमें संपूर्ण ब्रह्मांड, देवता, ऋषि, लोक, ग्रह-नक्षत्र और समस्त चराचर सृष्टि एक ही स्थान पर समाहित दिखाई देती है। भगवान का यह स्वरूप अनंत तेज से प्रकाशित है, मानो हजारों सूर्य एक साथ उदित हो गए हों।

    किन्तु यह दर्शन केवल सौंदर्य और वैभव का प्रतीक नहीं है। अर्जुन भगवान के उस रूप को भी देखते हैं जो सृष्टि के सृजन के साथ-साथ उसके संहार की शक्ति का भी प्रतिनिधित्व करता है। इस विराट स्वरूप की महिमा और प्रचंडता को देखकर अर्जुन विस्मय, श्रद्धा और भय से भर उठते हैं।

    यह एपिशोड हमें यह समझने की प्रेरणा देता है कि परमात्मा केवल करुणा और प्रेम के ही नहीं, बल्कि अनंत शक्ति, काल और ब्रह्मांडीय व्यवस्था के भी अधिष्ठाता हैं। जब मनुष्य इस सत्य को स्वीकार करता है, तब उसके भीतर विनम्रता, समर्पण और ईश्वर के प्रति गहन श्रद्धा का भाव जागृत होता है।

    यदि आप विश्वरूपदर्शनयोग के इस अद्भुत और रहस्यपूर्ण प्रसंग को गहराई से समझना चाहते हैं, तो यह एपिशोड आपके लिए एक महत्वपूर्ण आध्यात्मिक अनुभव सिद्ध होगा।

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    23 分
  • विश्वरूपदर्शनयोग (श्लोक 1–12): अर्जुन को प्राप्त हुआ विराट विश्वरूप का दिव्य दर्शन
    2026/06/08

    “गीता-योग: अध्यात्मिक प्रबोधन की श्रवण यात्रा” के इस विशेष एपिशोड में हम अध्यात्मिक प्रबोधन: गीता के 18 योग के खंड 12 — विश्वरूपदर्शनयोग के अंतर्गत श्लोक 1 से 12 के मूल पाठ, अर्थ और आध्यात्मिक व्याख्या पर चर्चा करेंगे।

    इस प्रसंग में अर्जुन भगवान श्रीकृष्ण के उपदेशों को सुनकर उनके वास्तविक दिव्य स्वरूप को देखने की इच्छा प्रकट करते हैं। अर्जुन की श्रद्धा और जिज्ञासा से प्रसन्न होकर श्रीकृष्ण उन्हें दिव्य दृष्टि प्रदान करते हैं, जिससे वे उस विराट विश्वरूप का दर्शन कर सकें जिसे सामान्य मानव नेत्रों से देख पाना संभव नहीं है।

    इस दिव्य दर्शन में अर्जुन सम्पूर्ण ब्रह्मांड, देवताओं, ऋषियों, लोकों और समस्त चराचर सृष्टि को भगवान के एक ही स्वरूप में समाहित देखते हैं। हजारों सूर्यों के एक साथ उदित होने जैसी अद्भुत ज्योति उस विश्वरूप की महिमा का संकेत देती है। यह दृश्य अर्जुन को यह बोध कराता है कि परमात्मा ही सृष्टि के सृजन, पालन और संहार के एकमात्र आधार हैं।

    यह एपिशोड हमें सिखाता है कि ईश्वर को सीमित रूपों में नहीं, बल्कि संपूर्ण सृष्टि में व्याप्त अनंत चेतना के रूप में देखने का प्रयास करना चाहिए। श्रद्धा, समर्पण और दिव्य दृष्टिकोण ही हमें उस सत्य के निकट ले जाते हैं, जिसे अर्जुन ने विश्वरूप दर्शन के माध्यम से अनुभव किया।

    यदि आप गीता के इस अद्भुत और विस्मयकारी प्रसंग को गहराई से समझना चाहते हैं, तो यह एपिशोड आपके लिए अत्यंत प्रेरणादायक और ज्ञानवर्धक सिद्ध होगा।

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    22 分
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