『Agnipunj : Shaheed Chandrashekhar Azad Ki Krantikari Jeevan Katha』のカバーアート

Agnipunj : Shaheed Chandrashekhar Azad Ki Krantikari Jeevan Katha

プレビューの再生
¥2,469 で会員登録とタイトル購入をする ¥2,370で会員登録とタイトル購入をする
期間限定:2026年10月19日(日本時間)に終了
2026年10月19日まで対象者限定でプレミアムプランが4か月 月額99円キャンペーン開催中。詳細はこちら。
オーディオブック・ポッドキャスト・オリジナル作品など数十万以上の対象作品が聴き放題。
オーディオブックをお得な会員価格で購入できます。
会員登録は5か月目以降は月額¥1,500で自動更新します。いつでも退会できます。
オーディオブック・ポッドキャスト・オリジナル作品など数十万以上の対象作品が聴き放題。
オーディオブックをお得な会員価格で購入できます。
30日間の無料体験後は月額¥1500で自動更新します。いつでも退会できます。

Agnipunj : Shaheed Chandrashekhar Azad Ki Krantikari Jeevan Katha

著者: Sudhir Vidyarthi
ナレーター: Vikrant Chaturvedi
¥2,370で会員登録とタイトル購入をする ¥2,370で会員登録とタイトル購入をする

30日間の無料体験後は月額¥1500で自動更新します。いつでも退会できます。

30日間の無料体験後は月額¥1500で自動更新します。いつでも退会できます。

¥3,390 で購入

¥3,390 で購入

【Amazonプライム会員限定】今ならプレミアムプランが4か月 月額99円。

10月19日まで。※適用条件あり
अग्निपुंज: शहीद चन्द्रशेखर आज़ाद असहयोग आन्दोलन गांधीजी का बिल्कुल अनूठा और नया प्रयोग था। असहयोग की लहर में पूरा देश बह गया था। एक 14 वर्षीय छात्र ने भी इसमें अपनी आहुति दी। चन्द्रशेखर नाम के इस किशोर ने अदालत में अपना नाम ‘आज़ाद’ बताया। तब से वह आज़ाद ही रहा। एक किशोर असहयोगी से भारतीय क्रान्तिकारी दल के अजेय सेनापति बनने तक की आज़ाद की महागाथा अत्यन्त रोमांचकारी है। वे बहुत गरीब और रूढ़िवादी ब्राह्मण परिवार में जन्मे मगर विद्रोही व्यक्तित्व के कारण उससे जल्दी ही मुक्ति पा ली। शुरुआती दौर में वे असहयोगी बने लेकिन तेजी से छलाँग लगाकर क्रान्तिकारी पार्टी की सदस्यता ले ली और थोड़े ही समय बाद उसके ‘कमांडर-इन-चीफ’ नियुक्त हो गए। वे पुलिस की आँखों में लगातार धूल झोंककर बड़े करतब करते रहे। आज़ाद जीते-जी किंवदन्ती बन गए थे। जनता में वे बेहद लोकप्रिय थे। उन पर अनेक लोकगीत रचे और गाए गए। मगर आज़ाद की स्मृति-रक्षा के लिए सरकार की ओर से कोई प्रयास नहीं किए गए। उनका जन्मस्थान भावरा (मध्य प्रदेश) तथा पैतृक घर बदरका (उन्नाव) में आज भी उनकी यादों को सँजोए खामोश खड़ा है। उनकी माताजी श्रीमती जगरानी देवी ने स्वतन्त्र भारत में अपने अन्तिम दिन अत्यन्त दयनीय स्थितियों में गुजारे। हम उन्हें एक राष्ट्रीय शहीद की माँ का दर्जा और सम्मान नहीं दे पाए। आज आज़ाद का कोई क्रान्तिकारी साथी जीवित नहीं है। स्वतन्त्र भारत में उनके सारे साथियों की एक-एक कर मौत होती रही और किसी ने नहीं जाना। वे सब गुमनाम चले गए जिनके न रहने पर किसी ने आँसू नहीं बहाए, न कोई मातमी धुन बजी। किसी को पता ही न लगा कि ज़मीं उन आस्माओं को कब कहाँ निगल गई...। यह पुस्तक आज़ाद की संस्मृतियों से रची गई है जो न केवल उनकी कहानी से हमें रू-ब-रू कराती है बल्कि उनके दौर की राजनीतिक हलचलों और अनेक गुमनाम क्रांतिकारियों की याद दिलाती है जिन्होंने आज़ादी के संग्राम में अपनी आहुति दी।
adbl_web_anon_alc_button_suppression_t1
まだレビューはありません