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[Hindi] ॐकार का चमत्कार (भाग 4): अनेक नहीं, केवल एक ही चेतना है!

[Hindi] ॐकार का चमत्कार (भाग 4): अनेक नहीं, केवल एक ही चेतना है!

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[Preview books] [Borrow books] [Pause] पिछले कुछ एपिसोडों में हमने चेतना के बारे में चर्चा की। हमने चेतना की चार अवस्थाओं—जाग्रत अवस्था, स्वप्न अवस्था, सुषुप्ति अवस्था और तुरीय की अवर्णनीय अवस्था—के बारे में बात की। सभी जीवधारी अलग-अलग समय पर इन चार अवस्थाओं में से किसी-न-किसी एक का अनुभव करते हैं।हमारी यह चर्चा भारत के प्राचीन उपनिषदों में से एक, माण्डूक्य उपनिषद, पर आधारित थी।पिछले एपिसोड के अंत में मैंने संकेत दिया था कि भारत के अनेक अद्वैत दार्शनिक इन चेतना-अवस्थाओं के बारे में एक भिन्न दृष्टिकोण रखते हैं। इस एपिसोड में मैं गौड़पाद द्वारा अपनी प्रसिद्ध माण्डूक्य कारिका—अर्थात् माण्डूक्य उपनिषद पर लिखी गई उनकी व्याख्या—में प्रस्तुत वैकल्पिक दृष्टिकोण का संक्षेप में वर्णन करूँगा।गौड़पाद कौन थे?गौड़पाद अद्वैत परंपरा के मूल दार्शनिक थे। उनका समय छठी शताब्दी ईस्वी का माना जाता है। वे प्रसिद्ध अद्वैत दार्शनिक शंकराचार्य के परमगुरु (गुरु के गुरु) थे।गौड़पाद ने क्या कहा? गौड़पाद के अनुसार, माण्डूक्य उपनिषद में वर्णित चेतना की पहली तीन अवस्थाएँ केवल आभास हैं; वे वास्तविक नहीं हैं। वास्तविक अवस्था केवल तुरीय है, और वही अकेली अन्य तीन अवस्थाओं के रूप में प्रकट होती है।यह समझानेकेलिए कि चेतना की एकमात्र अवस्था अन्य तीन अवस्थाओं के रूप में कैसे दिखाई देती है, गौड़पाद अनेक उपमाएँ देते हैं।स्वप्न की उपमा:जब कोई व्यक्ति स्वप्न देखता है, तब वह अनेक लोगों, अनेक स्थानों और अनेक घटनाओंकोदेखताहै। लेकिन वास्तव में वे सभी एक ही मन की रचना होते हैं—अर्थात् स्वप्न देखने वाले के मन की। उसी प्रकार गौड़पाद कहते हैं कि एक ही सार्वभौमिक चेतना अनेक जीवों के अस्तित्व का आभास उत्पन्न करती है, जिनमें से प्रत्येक किसी-न-किसी विशेष चेतना-अवस्था में प्रतीत होता है।इन जीवों का कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं है। वे स्वप्न में दिखाई देने वाले दृश्यों के समान हैं। स्वप्न समाप्त होते ही उसके सभी दृश्य और वस्तुएँ लुप्त हो जाती हैं, क्योंकि उनका वास्तव में कभी अस्तित्व था ही नहीं। वे केवल अस्तित्ववान प्रतीत होते थे। इसी प्रकार वास्तविकता में दिखाई देने वाली यह विविधता भी केवल प्रतीत होती है।यह समझानेकेलिए कि केवल एक चेतना ...
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