『सर्वव्यापी, अविनाशी और दिव्य स्वरूप』のカバーアート

सर्वव्यापी, अविनाशी और दिव्य स्वरूप

सर्वव्यापी, अविनाशी और दिव्य स्वरूप

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概要

“गीता-योग: अध्यात्मिक प्रबोधन की श्रवण यात्रा” के आज के इस एपिशोड में हम श्रीमद्भगवद्गीता के नौवें अध्याय के उन गूढ़ और दिव्य अंशों पर चर्चा करते हैं, जहाँ भगवान श्रीकृष्ण अपने सर्वव्यापी, अविनाशी और दिव्य स्वरूप का स्वयं उद्घाटन करते हैं।

इस चर्चा में स्पष्ट किया गया है कि क्यों अज्ञानी लोग ईश्वर को केवल एक साधारण मानव मान लेते हैं, जबकि महात्मा उन्हें समस्त सृष्टि का मूल कारण जानकर उनकी अनन्य भक्ति करते हैं। श्रीकृष्ण स्वयं को यज्ञ, मंत्र, माता-पिता, सृष्टि के आदि और अंत के रूप में परिभाषित करते हुए यह बताते हैं कि वे ही इस चराचर जगत के आधार हैं।

एपिशोड में ज्ञान-मार्ग और भक्ति-मार्ग के अंतर को गहराई से समझाया गया है—जहाँ कर्मकांडों से प्राप्त स्वर्ग को क्षणिक बताया गया है, वहीं प्रभु के प्रति पूर्ण समर्पण को शाश्वत मोक्ष का साधन कहा गया है।

यह एपिशोड हमें सांसारिक मोह और अज्ञान से ऊपर उठकर ईश्वर के विराट और निर्लिप्त स्वरूप को समझने की प्रेरणा देता है, और यह स्मरण कराता है कि सच्चा सुख और मुक्ति केवल श्रद्धा, भक्ति और आत्मबोध से ही संभव है।

🎧 यह श्रृंखला अब प्रति मंगलवार नियमित रूप से प्रसारित होती है।

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