सरस्वती सुता | डॉ. विनोद कुमार वर्मा की चर्चित लघुकथा
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सुरता : साहित्य की धरोहर के इस विशेष कहानी-वाचन अंक में प्रस्तुत है प्रख्यात व्याकरणविद्, कहानीकार एवं समीक्षक डॉ. विनोद कुमार वर्मा की बहुचर्चित लघुकथा "सरस्वती सुता"।
यह कहानी साहित्यिक पुरस्कारों की चयन-प्रक्रिया, विद्वानों के अहंकार, गुटबाजी और निष्पक्ष निर्णय की चुनौती पर तीखा व्यंग्य करती है। जब अनुभवी साहित्यकार निर्णय लेने में असमर्थ हो जाते हैं, तब नौ वर्ष की बालिका निकिता अपनी सहज बुद्धि, निष्पक्ष दृष्टि और तर्कपूर्ण विचार से ऐसा समाधान प्रस्तुत करती है, जो सभी को चकित कर देता है।
इस रचना को साहित्य-जगत में व्यापक सराहना मिली है।
समीक्षक मणिशंकर दुबे 'रामरागी' ने इसे "गागर में सागर" की परंपरा का उत्कृष्ट उदाहरण बताते हुए कहा है कि यह लघुकथा सच्चे ज्ञान, विनम्रता और निष्पक्षता का संदेश देती है।
सुप्रसिद्ध साहित्यकार डॉ. चंद्रपाल सिंह यादव ने इसे कहानी-कला के नव्य मानदण्डों को स्पर्श करने वाली परिपूर्ण कहानी बताया है तथा इसकी कथावस्तु, शिल्प और निष्पक्ष चिंतन की विशेष प्रशंसा की है।
इसके अतिरिक्त नरेन्द्र कौशिक, मोहन लाल कौशिक, डॉ. भावना सावलिया, सुरेश सिंह बैस (प्रयास प्रकाशन) तथा डॉ. सुषमा त्रिपाठी सहित अनेक साहित्यकारों ने इस कहानी को प्रेरणादायी, प्रवाहपूर्ण, शिक्षाप्रद और उत्कृष्ट रचना बताया है।
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सुरता : साहित्य की धरोहर
"शब्दों से संस्कृति, साहित्य से संवेदना।"
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