समस्त क्रियाओं का स्रोत - ब्रह्म
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概要
एकादशोपनिषद्–प्रसाद की इस विशेष कड़ी में केनोपनिषद् के माध्यम से उस गहन आध्यात्मिक सत्य का उद्घाटन किया गया है, जो मानव जीवन की समस्त गतिविधियों का मूल आधार है। यह एपिसोड हमें यह समझने की दिशा देता है कि मन, प्राण, वाणी और इंद्रियाँ स्वयं में स्वतंत्र शक्तियाँ नहीं हैं, बल्कि वे एक अदृश्य, सर्वव्यापक चेतना—ब्रह्म—पर पूर्णतः आश्रित हैं।
इस प्रस्तुति में यह स्पष्ट किया गया है कि यद्यपि मन विचार करता है, वाणी अभिव्यक्त करती है, प्राण जीवन को गतिशील रखता है और इंद्रियाँ अनुभव कराती हैं, फिर भी इन सबकी वास्तविक प्रेरणा और ऊर्जा का स्रोत वही परम तत्व है। केनोपनिषद् की शिक्षाओं के अनुसार ब्रह्म को मन या वाणी के माध्यम से पूर्णतः समझा या व्यक्त नहीं किया जा सकता; वह इंद्रियों की सीमा से परे है। किंतु paradox यह है कि वही ब्रह्म इन सबको कार्य करने की शक्ति प्रदान करता है।
अन्य उपनिषदों तथा धर्मग्रंथों के दृष्टांतों के माध्यम से यह सिद्ध किया गया है कि ब्रह्म ज्ञान का विषय नहीं, बल्कि अनुभव का विषय है। वह तर्क की पकड़ से परे होते हुए भी आत्मसाक्षात्कार के द्वारा अनुभूत किया जा सकता है।
यह एपिसोड श्रोता को आत्मचिंतन के लिए प्रेरित करता है—कि जीवन की प्रत्येक सूक्ष्म और स्थूल क्रिया, चाहे वह श्वास हो या विचार, शब्द हो या कर्म—उसके पीछे एक ही परम स्रोत कार्यरत है। जब यह बोध जाग्रत होता है, तब जीवन अहंकार से मुक्त होकर कृतज्ञता और जागरूकता की दिशा में अग्रसर होता है।
यह कड़ी उन सभी जिज्ञासुओं और साधकों के लिए है, जो अपने अस्तित्व की जड़ों को समझना चाहते हैं और यह जानना चाहते हैं कि वास्तव में जीवन को गति देने वाला कौन है।