संत आलवन्दार (यमुनाचार्य)
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概要
संत चरित्रावली के इस विशेष एपिशोड में हम प्रस्तुत कर रहे हैं संत आलवन्दार (यमुनाचार्य) के जीवन की वह प्रेरणादायक कथा, जो अहंकार से आत्मबोध और राज्य से वैराग्य की अनुपम यात्रा है।
यह प्रसंग उस अद्वितीय बालक यमुना की कहानी कहता है, जिसने शास्त्रार्थ में एक अहंकारी पंडित को पराजित कर आधे राज्य का वैभव प्राप्त किया। उनकी असाधारण बुद्धि और नेतृत्व क्षमता से प्रभावित होकर रानी ने उन्हें “आलवन्दार” की उपाधि दी—अर्थात् शासन करने वाला। किंतु यह सांसारिक वैभव उनके जीवन का अंतिम सत्य नहीं था।
उनके दादा नाथमुनि द्वारा छोड़ी गई आध्यात्मिक धरोहर और गुरु मनक्काल नम्बि के करुण मार्गदर्शन ने यमुना के हृदय को झकझोर दिया। भगवद्गीता के दिव्य उपदेशों ने उनके भीतर वैराग्य का दीप प्रज्वलित किया और एक राजा का अंतर्मन भक्त में परिवर्तित हो गया।
कावेरी तट पर शेषनाग की शय्या पर विराजमान भगवान श्री रंगनाथ को ही उन्होंने अपना शाश्वत धन स्वीकार किया और शेष जीवन शरणागति, भक्ति और सेवा में समर्पित कर दिया।
यह एपिशोड हमें सिखाता है कि
सच्चा ऐश्वर्य सत्ता में नहीं,
बल्कि ईश्वर की शरण में है।