विश्वरूपदर्शनयोग: भगवान के विराट स्वरूप का दिव्य परिचय
カートのアイテムが多すぎます
カートに追加できませんでした。
ウィッシュリストに追加できませんでした。
ほしい物リストの削除に失敗しました。
ポッドキャストのフォローに失敗しました
ポッドキャストのフォロー解除に失敗しました
-
ナレーター:
-
著者:
“गीता-योग: अध्यात्मिक प्रबोधन की श्रवण यात्रा” के इस विशेष एपिशोड में हम आरंभ कर रहे हैं खंड 12 — विश्वरूपदर्शनयोग, जो श्रीमद्भगवद्गीता के अत्यंत गूढ़ और विस्मयकारी अध्यायों में से एक है।
इस चर्चा में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को अपने अनंत और विराट विश्वरूप का दर्शन कराते हैं। अर्जुन के मोह और सीमित दृष्टि को दूर करने के लिए श्रीकृष्ण उन्हें दिव्य दृष्टि प्रदान करते हैं, क्योंकि उस परम स्वरूप को साधारण नेत्रों से देख पाना संभव नहीं।
अर्जुन इस दिव्य दर्शन में संपूर्ण ब्रह्मांड, देवताओं, लोकों, पंचतत्वों और समस्त सृष्टि को भगवान में समाहित देखता है। इससे उसे यह बोध होता है कि परमात्मा ही सृष्टि के सृजन, पालन और संहार के एकमात्र आधार हैं।
यह एपिशोड स्पष्ट करता है कि ईश्वर केवल किसी एक साकार रूप तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे अपनी योगशक्ति और विभूतियों के माध्यम से कण-कण में व्याप्त हैं। विश्वरूपदर्शनयोग हमें यह सिखाता है कि सच्ची आध्यात्मिक दृष्टि तब विकसित होती है जब मनुष्य श्रद्धा, भक्ति और पूर्ण समर्पण के साथ परमात्मा को समस्त सृष्टि में अनुभव करने लगता है।
यदि आप गीता के विराट दर्शन और ईश्वर की सर्वव्यापकता को गहराई से समझना चाहते हैं, तो यह एपिशोड आपके लिए एक प्रेरणादायक आध्यात्मिक यात्रा सिद्ध होगा।