ध्यान का विज्ञान और आत्मज्ञान का रहस्य
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एकादशोपनिषद् प्रसाद की इस विशेष कड़ी में प्रस्तुत है काठकोपनिषद् प्रसाद के खंड 4: ब्रह्म की शक्ति और ज्ञान के अंतर्गत अध्याय 12 – “ध्यान और साधना के माध्यम से आत्मज्ञान” पर विचार।
इस एपिसोड में हम जानेंगे कि कठोपनिषद् आत्मज्ञान की प्राप्ति के लिए ध्यान, योग और साधना को क्यों अनिवार्य मानता है। यमराज द्वारा नचिकेता को दिए गए उपदेशों के माध्यम से यह समझाया गया है कि चंचल मन और इंद्रियों पर नियंत्रण स्थापित किए बिना आत्मा के वास्तविक स्वरूप का अनुभव संभव नहीं है। रथ के प्रसिद्ध रूपक के द्वारा शरीर, मन, बुद्धि और आत्मा के पारस्परिक संबंध को सरल एवं प्रभावशाली ढंग से स्पष्ट किया गया है।
इस चर्चा में प्रणव ‘ॐ’ के आध्यात्मिक महत्व, वैराग्य की आवश्यकता तथा निरंतर साधना की भूमिका पर भी प्रकाश डाला गया है। साथ ही यह समझने का प्रयास किया गया है कि किस प्रकार एक साधक बाहरी आकर्षणों से ऊपर उठकर अपने भीतर स्थित दिव्य चेतना का साक्षात्कार कर सकता है।
यदि आप ध्यान, योग, आत्मज्ञान और मोक्ष के मार्ग को उपनिषदों की दृष्टि से समझना चाहते हैं, तो यह एपिसोड आपके लिए एक महत्वपूर्ण आध्यात्मिक मार्गदर्शक सिद्ध होगा।
हरिः ॐ।