दक्षिण भारत की महान वैष्णव संत आण्डाल
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概要
संत चरित्रावली के इस पावन एपिसोड में हम प्रस्तुत कर रहे हैं दक्षिण भारत की महान वैष्णव संत आण्डाल के दिव्य जीवन की प्रेरणादायक कथा। देवी लक्ष्मी के भू-देवी स्वरूप मानी जाने वाली आण्डाल, विष्णुचित्त द्वारा तुलसी के पौधे के नीचे प्राप्त हुई थीं। बाल्यकाल से ही उनका हृदय भगवान रंगनाथ के प्रति अनन्य प्रेम और गोपी-भाव से परिपूर्ण था।
आण्डाल की भक्ति की विशेषता यह थी कि वे भगवान को वही पुष्पमालाएँ अर्पित करती थीं, जिन्हें वे स्वयं धारण करती थीं—और ईश्वर ने उस निष्कलंक प्रेम को सहर्ष स्वीकार किया। उन्होंने तिरुप्पावै और नाचियार तिरुमोलि जैसे अमर भक्ति-काव्य की रचना की, जो आज भी भक्तों को ईश्वर-प्रेम और आत्मसमर्पण का मार्ग दिखाते हैं।
मात्र चौदह वर्ष की आयु में, श्रीरंगम मंदिर में भगवान रंगनाथ के साथ सायुज्य प्राप्त कर, आण्डाल इस संसार से विलीन हो गईं। यह एपिसोड उनके निस्वार्थ प्रेम, माधुर्य भक्ति और आध्यात्मिक शक्ति को भावपूर्ण रूप में प्रस्तुत करता है, जो हर साधक को भीतर से स्पर्श करता है।