कौन प्राण को गति देता है?
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概要
एकादशोपनिषद्–प्रसाद की इस कड़ी में केनोपनिषद् के अत्यंत सूक्ष्म और गहन दार्शनिक प्रश्न को केंद्र में रखा गया है, जहाँ जीवन के मूल आधार प्राण और उसे गति देने वाली अदृश्य परम शक्ति के संबंध का विवेचन किया गया है। यह एपिसोड हमें उस प्रश्न की ओर ले जाता है—जिसके बिना न श्वास संभव है, न चेतना और न ही जीवन की निरंतरता।
इस प्रसंग में स्पष्ट किया गया है कि यद्यपि प्राण शरीर की समस्त जैविक और मानसिक क्रियाओं का आधार प्रतीत होता है, किंतु वह स्वयं स्वतंत्र सत्ता नहीं है। उसके पीछे कार्यरत है वह परम चेतना—ब्रह्म, जो दृश्य और अदृश्य दोनों लोकों का नियंता है। केनोपनिषद् के मूल भाव को समझाते हुए बताया गया है कि मन, प्राण और इंद्रियाँ सभी उसी ब्रह्म से प्रेरणा पाकर कार्य करती हैं।
एपिसोड में भगवद्गीता और बृहदारण्यक उपनिषद् के सारगर्भित उद्धरणों के माध्यम से यह स्थापित किया गया है कि ईश्वर ही श्वास-प्रश्वास, जीवन-ऊर्जा और चेतना की गति का वास्तविक स्रोत है। एक सरल किंतु प्रेरक लघु कथा द्वारा यह बोध कराया गया है कि जैसे तेल के बिना दीपक प्रकाशित नहीं हो सकता, वैसे ही ब्रह्म के अभाव में प्राण भी निष्क्रिय हो जाता है।
यह एपिसोड श्रोता को केवल दार्शनिक जानकारी नहीं देता, बल्कि उसे आत्मचिंतन की ओर प्रेरित करता है—जहाँ वह यह समझ सके कि मन और प्राण केवल उपकरण हैं, जबकि उनकी वास्तविक प्रेरक शक्ति स्वयं ब्रह्म है। अंततः यह प्रसंग जीवन के प्रति कृतज्ञता, विनम्रता और आत्म-साक्षात्कार की भावना को जाग्रत करता है।
यह प्रस्तुति उन सभी साधकों और जिज्ञासुओं के लिए है, जो जीवन के मूल रहस्य को समझना चाहते हैं और उपनिषद् के आलोक में आत्मा तथा ब्रह्म के संबंध का अनुभव करना चाहते हैं।